dhoop thii sehra tha lekin jism ka saaya na tha | धूप थी सहरा था लेकिन जिस्म का साया न था

  - Nafas Ambalvi
धूपथीसहराथालेकिनजिस्मकासायाथा
आदमीइससेज़ियादातोकभीतन्हाथा
खींचतेथेअपनीजानिबरेगज़ारोंकेसराब
दूरतकसहरामेंलेकिनआबकाक़तराथा
एकमुबहमख़्वाबथाआँखोंमेंऔरदिलमेंजुनूँ
ज़ेहनमेंलेकिनइमारतकाकोईनक़्शाथा
भीड़थीबस्तीमेंलेकिनमैंकिसेपहचानता
इतनेलोगोंमेंकिसीभीशख़्सकाचेहराथा
इसक़दरशिद्दतसेवोदरियासमुंदरसेमिला
अबसमुंदरहीसमुंदरथाकहींदरियाथा
घरकीअज़्मतहाएजिसदीवारसेमहफ़ूज़थी
घरकेदरवाज़ेपेअबवोटाटकापर्दाथा
वोग़ज़लअपनीसजाताथालहूकेरंगसे
फिरभीकहतेहैं'नफ़स'उसकाकोईपेशाथा
  - Nafas Ambalvi
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