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Naeem Zarrar Ahmad
vo mire dil men yuñ samaa ke gaii
vo mire dil men yuñ samaa ke gaii | वो मिरे दिल में यूँँ समा के गई
- Naeem Zarrar Ahmad
वो
मिरे
दिल
में
यूँँ
समा
के
गई
लाख
चाहा
मगर
न
जा
के
गई
एक
अर्सा
हुआ
कभी
न
खुली
दिल
पे
जो
गिरह
वो
लगा
के
गई
रात
ग़म
की
कटे
नहीं
कटती
सुब्ह
इक
पल
में
मुस्कुरा
के
गई
मान
टूटे
तो
फिर
नहीं
जुड़ता
बद-गुमानी
कभी
न
आ
के
गई
ऐ
'नईम'
अब
न
वापसी
होगी
बारहा
ज़िंदगी
बता
के
गई
- Naeem Zarrar Ahmad
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ग़म-ए-हयात
में
यूँँ
ढह
गया
नसीब
का
घर
कि
जैसे
बाढ़
में
डूबा
हुआ
गरीब
का
घर
वबायें
आती
गईं
और
लोग
मरते
गए
हमारे
गाँव
में
था
ही
नहीं
तबीब
का
घर
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Ashraf Ali
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तल्ख़ियाँ
इस
में
बहुत
कुछ
हैं
मज़ा
कुछ
भी
नहीं
ज़िंदगी
दर्द-ए-मोहब्बत
के
सिवा
कुछ
भी
नहीं
Kaleem Aajiz
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चार
दिन
झूठी
बाहों
के
आराम
से
मेरी
बिखरी
हुई
ज़िंदगी
ठीक
है
दोस्ती
चाहे
जितनी
बुरी
हो
मगर
प्यार
के
नाम
पर
दुश्मनी
ठीक
है
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SHIV SAFAR
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ज़िंदगी
क्या
किसी
मुफ़लिस
की
क़बा
है
जिस
में
हर
घड़ी
दर्द
के
पैवंद
लगे
जाते
हैं
Faiz Ahmad Faiz
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हाए
क्या
दौर-ए-ज़िंदगी
गुज़रा
वाक़िए
हो
गए
कहानी
से
Gulzar Dehlvi
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जब
से
हुआ
है
कंधे
से
बस्ते
का
बोझ
कम
बढ़ते
ही
जा
रहे
हैं
मेरी
ज़िंदगी
में
ग़म
Ankit Maurya
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बस
एक
मोड़
मिरी
ज़िंदगी
में
आया
था
फिर
इस
के
बाद
उलझती
गई
कहानी
मेरी
Abbas Tabish
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धूप
में
निकलो
घटाओं
में
नहा
कर
देखो
ज़िंदगी
क्या
है
किताबों
को
हटा
कर
देखो
Nida Fazli
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ज़िंदगी
यूँँही
बहुत
कम
है
मोहब्बत
के
लिए
रूठ
कर
वक़्त
गँवाने
की
ज़रूरत
क्या
है
Unknown
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बद-हवा
सेी
है
बे-ख़याली
है
क्या
ये
हालत
भी
कोई
हालत
है
ज़िंदगी
से
है
जंग
शाम-ओ-सहर
मौत
से
शिकवा
है
शिकायत
है
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Chandan Sharma
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ग़ैर
के
घर
सही
वो
आया
तो
ग़म
ही
मेरे
लिए
वो
लाया
तो
दुश्मनों
को
मुआ'फ़
कर
डाला
दोस्तों
से
फ़रेब
खाया
तो
पेड़
के
घोंसलों
का
क्या
होगा
घर
उसे
काट
कर
बनाया
तो
फिर
मिरे
सामने
थी
इक
दीवार
एक
दीवार
को
गिराया
तो
किस
क़दर
ज़ोर
से
हुई
बारिश
मैं
ने
काग़ज़
का
घर
बनाया
तो
क्या
करोगे
'नईम'
साल-ए-नौ
पेश-रौ
की
तरह
ही
आया
तो
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Naeem Zarrar Ahmad
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तेरी
आँखों
के
दो
सितारे
थे
जिन
पे
हम
दो
जहान
हारे
थे
सारी
ता'रीफ़
थी
उसे
ज़ेबा
जितने
बोहतान
थे
हमारे
थे
जितनी
आँखें
थीं
सारी
मेरी
थीं
जितने
मंज़र
थे
सब
तुम्हारे
थे
दिन
वही
उम्र
भर
का
हासिल
हैं
जो
तिरी
याद
में
गुज़ारे
थे
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Naeem Zarrar Ahmad
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हो
गए
हम
शिकार
फूलों
के
हैं
ग़ज़ब
इख़्तियार
फूलों
के
मेरी
तन्हाइयाँ
बताती
हैं
फूल
होते
हैं
यार
फूलों
के
एक
मंज़िल
है
मुख़्तलिफ़
राहें
रंग
हैं
बे-शुमार
फूलों
के
आज
फूलों
के
आलमी
दिन
पर
उस
ने
भेजे
हैं
ख़ार
फूलों
के
फूल
हैं
शे'र
बू-ए-गुल
धुन
है
हम
हैं
नग़्मा-निगार
फूलों
के
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Naeem Zarrar Ahmad
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गिन
रहे
हैं
दिल-ए-नाकाम
के
दिन
फिर
वही
गर्दिश-ए-अय्याम
के
दिन
दुख
से
आग़ाज़
और
ग़म
पे
अख़ीर
हम
ने
पाए
बड़े
इनआ'म
के
दिन
है
यही
सोच
कर
आराम
हमें
मिल
गए
हैं
उन्हें
आराम
के
दिन
अब
नहीं
काम
कोई
दुनिया
का
गोया
ये
दिन
हैं
बड़े
काम
के
दिन
हैं
वो
फिर
से
मिरे
नज़दीक
'नईम'
आए
अंदेशा-ए-अंजाम
के
दिन
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Naeem Zarrar Ahmad
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किसी
महल
में
न
शाहों
की
आन-बान
में
है
सुकून
जो
किसी
ढाबे
के
साएबान
में
है
मैं
उस
मक़ाम
पर
हूँ
जैसे
कोई
ख़ाली
हाथ
निगाह-ए-हसरत-ओ-अरमाँ
लिए
दुकान
में
है
दरिंदे
शहर
में
आबाद
हो
गए
सारे
सुना
है
साथ
का
जंगल
बड़ी
अमान
में
है
ये
जानता
है
पलट
कर
उसे
नहीं
आना
वो
अपनी
ज़ीस्त
की
खिंचती
हुई
कमान
में
है
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Naeem Zarrar Ahmad
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