manzil hai to ik rasta-e-dushwaar men gum hai | मंज़िल है तो इक रस्ता-ए-दुश्वार में गुम है

  - Naeem Zarrar Ahmad
मंज़िलहैतोइकरस्ता-ए-दुश्वारमेंगुमहै
रस्ताहैतोपेच-ओ-ख़म-ए-दिलदारमेंगुमहै
जिसदीनसेमिलताथाख़ुदाख़ाना-ए-दिलमें
मुल्लाकेसजाएहुएबाज़ारमेंगुमहै
अज्ज़ा-ए-सफ़रवर्ता-ए-हैरतमेंपड़ेहैं
रफ़्तारअभीसाहिब-ए-रफ़्तारमेंगुमहै
साइलहैंकिउमडेहीचलेआतेहैंपैहम
वोशोख़मगरअपनेहीदीदारमेंगुमहै
वोहुस्न-ए-यगानाहैकोईशहर-ए-तिलिस्मात
हरशख़्सजहाँरस्तोंकेअसरारमेंगुमहै
अश्ख़ासकेजंगलमेंखड़ासोचरहाहूँ
इकनख़्ल-ए-तमन्नाउन्हींअश्जारमेंगुमहै
याहुस्नहैना-वाक़िफ़-ए-पिंदार-ए-मोहब्बत
याइश्क़हीआसानी-ए-अतवारमेंगुमहै
काशसमझताकोईपस-मंज़र-ए-पैग़ाम
दुनियाहैकिपैराया-ए-इज़हारमेंगुमहै
  - Naeem Zarrar Ahmad
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