kudoorat badh ke aaKHir ko nikalti hai fugaan ho kar | कुदूरत बढ़ के आख़िर को निकलती है फ़ुग़ाँ हो कर

  - Nadir Kakorvi
कुदूरतबढ़केआख़िरकोनिकलतीहैफ़ुग़ाँहोकर
ज़मींयेसरपरजातीहैइकदिनआसमाँहोकर
मिरेनक़्श-ए-क़दमनेराहमेंकाँटेबिछाएहैं
बताएँतोवोघरग़ैरोंकेजाएँगेकहाँहोकर
ख़ुदाससर-कशीकीपीर-ए-ज़ाहिदइसक़दरतूने
कितेरातीरसाक़दहोगयाहैअबकमाँहोकर
कोईपूछेकिमय्यतकाभीतुमकुछसाथदेतेहो
येआएमर्सियालेकरवोआएनौहा-ख़्वाँहोकर
इरादापीर-ए-ज़ाहिदसेहैअबतुर्की-ब-तुर्कीका
किसीभट्टीपेजाबैठूँगामैंपीर-ए-मुग़ाँहोकर
तलाश-ए-यारक्याऔरसैरक्याहम-नशींहमतो
चलेऔरघरचलेआएयहाँहोकरवहाँहोकर
'सुख़न'कीबज़्ममें'नादिर'उसीकेसरपेसेहराहै
रहाजोहम-नवा-ए-बुलबुल-ए-हिन्दोस्ताँहोकर
  - Nadir Kakorvi
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