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Muzdum Khan
main pareshaan vo dukhi hui hai
main pareshaan vo dukhi hui hai | मैं परेशान वो दुखी हुई है
- Muzdum Khan
मैं
परेशान
वो
दुखी
हुई
है
ये
मोहब्बत
है
तो
बड़ी
हुई
है
कुछ
भी
अपना
नहीं
है
मेरे
पास
बद्दुआ
भी
किसी
की
दी
हुई
है
उस
ने
पूछी
है
आख़िरी
ख़्वाहिश
और
मोहब्बत
भी
मैं
ने
की
हुई
है
आज
ग़ुस्सा
नहीं
पिऊॅंगा
मैं
आज
मैं
ने
शराब
पी
हुई
है
मैं
तुम्हें
इतनी
बार
चाहता
हूॅं
जितनी
औरत
पे
शा'इरी
हुई
है
बच्चा
गिरवा
के
क्या
मिलेगा
तुम्हें
दुनिया
पहले
बहुत
गिरी
हुई
है
- Muzdum Khan
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इश्क़
में
तेरे
गँवा
दी
ये
जवानी
जानेमन
हो
गई
दिलचस्प
अपनी
भी
कहानी
जानेमन
Tanoj Dadhich
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इश्क़
पर
ज़ोर
नहीं
है
ये
वो
आतिश
'ग़ालिब'
कि
लगाए
न
लगे
और
बुझाए
न
बने
Mirza Ghalib
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इश्क़
माशूक़
इश्क़
'आशिक़
है
यानी
अपना
ही
मुब्तला
है
इश्क़
Meer Taqi Meer
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गर
अदीबों
को
अना
का
रोग
लग
जाए
तो
फिर
गुल
मोहब्बत
के
अदब
की
शाख़
पर
खिलते
नहीं
Afzal Ali Afzal
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दुख
तो
बहुत
मिले
हैं
मोहब्बत
नहीं
मिली
यानी
कि
जिस्म
मिल
गया
औरत
नहीं
मिली
मुझको
पिता
की
आँख
के
आँसू
तो
मिल
गए
मुझको
पिता
से
ज़ब्त
की
आदत
नहीं
मिली
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Abhishar Geeta Shukla
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राह-ए-दूर-ए-इश्क़
में
रोता
है
क्या
आगे
आगे
देखिए
होता
है
क्या
Meer Taqi Meer
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रोज़
मिलने
पे
भी
लगता
था
कि
जुग
बीत
गए
इश्क़
में
वक़्त
का
एहसास
नहीं
रहता
है
Ahmad Mushtaq
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लिखी
होगी
मोहब्बत
जिन
सफ़ों
पर
मेरा
दावा
है
वो
नम
ही
मिलेंगे
किसी
दिन
ऊब
जाओगे
सभी
से
तुम्हें
उस
रोज़
फिर
हम
ही
मिलेंगे
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Ritesh Rajwada
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इक
कली
की
पलकों
पर
सर्द
धूप
ठहरी
थी
इश्क़
का
महीना
था
हुस्न
की
दुपहरी
थी
ख़्वाब
याद
आते
हैं
और
फिर
डराते
हैं
जागना
बताता
है
नींद
कितनी
गहरी
थी
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Vikram Gaur Vairagi
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मोहब्बत
करने
वाले
कम
न
होंगे
तिरी
महफ़िल
में
लेकिन
हम
न
होंगे
Hafeez Hoshiarpuri
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मुझे
न
माँगती
तो
बोलती
ख़ुदा
दो
मुझे
बचा
लिया
है
गुनाह
से
तुम्हें
दु'आ
दो
मुझे
ये
लोग
देख
रहें
हैं
मेरी
चमक
में
तुम्हें
कहीं
अकेले
जलाना
अभी
बुझा
दो
मुझे
मुझे
किसी
से
मुहब्बत
नहीं
तुम्हारे
सिवा
तुम्हें
किसी
से
मुहब्बत
है
तो
बता
दो
मुझे
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Muzdum Khan
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वो
जो
मेरी
ताबकारी
में
पिघलने
लग
गया
जो
सितारा
भी
नहीं
था
वो
भी
जलने
लग
गया
ख़ूब-सूरत
औरतों
ने
कर
दी
बीनाई
अता
आँख
मलने
वाला
आख़िर
हाथ
मलने
लग
गया
दूसरा
पाँव
नहीं
रखने
दिया
मैंने
उसे
पहला
पाँव
रखते
ही
चश्मा
उबलने
लग
गया
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Muzdum Khan
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साल
के
तीन
सौ
पैंसठ
दिन
में
एक
भी
रात
नहीं
है
उसकी
वो
मुझे
छोड़
दे
और
ख़ुश
भी
रहे
इतनी
औक़ात
नहीं
है
उसकी
Muzdum Khan
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क्या
हुआ
जो
मुझे
हम-उम्र
मोहब्बत
न
मिली
मेरी
ख़्वाहिश
भी
यही
थी
कि
बड़ी
आग
लगे
Muzdum Khan
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न
सिर्फ़
ये
कि
जहन्नुम
ख़िताब
में
भी
नहीं
अली
के
मानने
वालों
के
ख़्वाब
में
भी
नहीं
Muzdum Khan
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