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Murli Dhakad
apne iraadon ko apni jeb men rakha hai
apne iraadon ko apni jeb men rakha hai | अपने इरादों को अपनी जेब में रखा है
- Murli Dhakad
अपने
इरादों
को
अपनी
जेब
में
रखा
है
टटोलते
टटोलते
आस्तीन
फट
गई
है
- Murli Dhakad
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मन
में
एक
इरादा
होता
है
ताबिश
राजा
पहले
प्यादा
होता
है
ताबिश
मानता
हूँ
मजबूरियाँ
थीं
कुछ
दिक्कत
थी
पर
वा'दा
तो
वा'दा
होता
है
ताबिश
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Vishal Singh Tabish
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है
किसी
जालिम
उदू
की
घात
दरवाज़े
में
है
या
मसाफ़त
है
नई
या
रात
दरवाज़े
में
है
जिस
तरहा
उठती
है
नजरें
बे-इरादा
बार-बार
साफ़
लगता
है
के
कोई
बात
दरवाजे
में
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Farhat Abbas Shah
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हमने
ही
लौटने
का
इरादा
नहीं
किया
उसने
भी
भूल
जाने
का
वा'दा
नहीं
किया
Parveen Shakir
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सफ़र
में
मुश्किलें
आएँ
तो
जुरअत
और
बढ़ती
है
कोई
जब
रास्ता
रोके
तो
हिम्मत
और
बढ़ती
है
Nawaz Deobandi
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दु'आ
करो
कि
सलामत
रहे
मिरी
हिम्मत
ये
इक
चराग़
कई
आँधियों
पे
भारी
है
Waseem Barelvi
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प्यार
करने
की
हिम्मत
नहीं
उनके
पास
और
हम
सेे
किनारा
भी
होता
नहीं
बात
सीधे
कही
भी
नहीं
जा
रही
और
कोई
इशारा
भी
होता
नहीं
उसको
उम्मीद
है
ऐश
होगी
बसर
साथ
में
जब
रहेगी
मिरे
वो
मगर
मुझपे
जितनी
मुहब्बत
बची
है
सखी
इतने
में
तो
गुज़ारा
भी
होता
नहीं
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Divyansh "Dard" Akbarabadi
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मुमकिना
फ़ैसलों
में
एक
हिज्र
का
फ़ैसला
भी
था
हमने
तो
एक
बात
की
उसने
कमाल
कर
दिया
Parveen Shakir
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हिम्मत,
ताकत,
प्यार,
भरोसा
जो
है
सब
इनसे
ही
है
कुछ
नंबर
हैं
जिन
पर
मैंने
अक्सर
फोन
लगाया
है
Pratap Somvanshi
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जीने
का
इरादा
है
मगर
फिर
भी
कहीं
से
कोई
तो
इशारा
हो
मिरा
अज़्म
जवाँ
हो
Sohit Singla
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उस
ने
फिर
प्यार
जताया
है
ख़ुदा
ख़ैर
करे
कोई
तो
नेक
इरादा
है
ख़ुदा
ख़ैर
करे
Nami Nadri
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और
कोई
ग़म
न
था
क्या
जमाने
में
दिल
दहल
उठा
है
आधे
ही
पैमाने
में
कोई
जन्नत
का
नाम
न
ले
लेना
ख़ुदा
के
साथ
खड़ा
हूँ
वीराने
में
और
भी
हैं
साक़ी
के
तलबगार
और
भी
लोग
हैं
मय-ख़ाने
में
तुम
मुझ
सेे
मेरा
हासिल
पुछते
हो
उम्र
गुज़री
है
तुमको
रिझाने
में
तुम
सीरत
में
मुझ
सेे
जुदा
हो
लेकिन
है
तुम्हारा
दर्द
भी
मेरे
अफ़साने
में
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Murli Dhakad
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ये
हमें
किसने
वर्चस्व
की
लड़ाई
दी
जो
है
ही
नहीं
उसे
खोते
हम
हैं
है
सारी
रात
का
दर्द
हम
कुत्तों
को
हो
कोई
उदास
रोते
हम
हैं
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Murli Dhakad
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जीना
कहते
हैं
जिसे
है
तमाशा
करना
जैसे
नशे
में
हो
फिर
से
नशा
करना
Murli Dhakad
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सुंदर
कोयल
सुंदर
कागा
सुंदर
मृग
के
नैन
भागे
'रिंद'
दौड़ता
जाए
दिवस
दिखे
ना
रैन
Murli Dhakad
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उसूल
अलग
हैं
जमीन
और
दलदल
के
कमल
को
छूना
मगर
ज़रा
संभल
के
अवतार
बदल
के
जो
आ
जाती
है
कभी
ख़ुशबू
हम
ये
कह
देते
हैं
आओ
कपड़े
बदल
के
इसी
पल
में
वो
मारे
जाएँगे
बेचारे
मुन्तज़िर
थे
जो
उम्र
भर
इसी
पल
के
कौन
सा
जमाना
आप
ने
देख
लिया
है
मेरी
आँखों
में
सभी
मंज़र
हैं
आजकल
के
अजीब
हैं
कि
अजीब
होना
नहीं
चाहते
रखते
हैं
जो
अपनी
शख़्सियत
बदल
के
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Murli Dhakad
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