labon pe harf-e-rajaz hai zirh utaar ke bhi | लबों पे हर्फ़-ए-रजज़ है ज़िरह उतार के भी

  - Mohsin Naqvi
लबोंपेहर्फ़-ए-रजज़हैज़िरहउतारकेभी
मैंजश्न-ए-फ़तहमनाताहूँजंगहारकेभी
उसेलुभासकामेरेबा'दकामौसम
बहुतउदासलगाख़ाल-ओ-ख़दसँवारकेभी
अबएकपलकातग़ाफ़ुलभीसहनहींसकते
हमअहल-ए-दिलकभीआदीथेइंतिज़ारकेभी
वोलम्हाभरकीकहानीकिउम्रभरमेंकही
अभीतोख़ुदसेतक़ाज़ेथेइख़्तिसारकेभी
ज़मीनओढ़लीहमनेपहुँचकेमंज़िलपर
किहमपेक़र्ज़थेकुछगर्द-ए-रहगुज़ारकेभी
मुझेसुनमिरेबे-शक्लअबदिखाईतोदे
मैंथकगयाहूँफ़ज़ामेंतुझेपुकारकेभी
मिरीदु'आकोपलटनाथाफिरउधर'मोहसिन'
बहुतउजाड़थेमंज़रउफ़ुक़सेपारकेभी
  - Mohsin Naqvi
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