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Krishna Mishra
Kis ko hai maa ke babu ji ke dukh
किसको है मां के बाबू जी के दुख
- Krishna Mishra
किसको
है
मां
के
बाबू
जी
के
दुख
था
में
है
सबको
दिलकशी
के
दुख
फंदे
पर
लटके
और
मर
जाऍं
जितने
हैं
मेरी
ज़िंदगी
के
दुख
मर्दों
को
चाहिए
बहुत
थोड़ा
सुन
ले
जो
कोई
नौकरी
के
दुख
कल
ही
तो
इश्क़
आया
तेरे
पास
आ
गए
आज
दिल-लगी
के
दुख
जा
दु'आ
है
तुझे
मुबारक
जान
तुझको
भी
खाऍं
सादगी
के
दुख
- Krishna Mishra
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ख़ुद
तो
क्यूँ
गुमनाम
थे
गर
करना
ही
था
इश्क़
था
जो
जान
को
तरदीद
क्या
दें
मरना
ही
था
इश्क़
था
जो
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मैं
बहुत
उलझा
था
तुमने
कर
दिया
आसान
मुझको
लौट
आई
जान
तुमने
कह
दिया
जब
जान
मुझको
दान
होकर
बेटियाँ
को
मिल
गई
हमदर्दियाँ
हैं
सो
मेरी
शादी
में
पापा
आप
करना
दान
मुझको
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अभी
बदन
का
ख़ून
नया
है
अभी
बहाना
बाक़ी
है
अभी
लहू
से
भाल
सजाना
तिलक
लगाना
बाक़ी
है
अभी
कहाॅं
वो
ज़ेहन
हुआ
है
जो
छूने
भर
से
ढह
जाए
अभी
अज़ल
पर
नाम
वतन
का
अमर
कराना
बाक़ी
है
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Krishna Mishra
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हमने
तेरी
याद
को
ज़रिया
बना
रक्खा
है
याद
जिसने
बूँद
को
दरिया
बना
रक्खा
है
Krishna Mishra
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ग़ज़ल
ऐसी
कहें
इक
लाश
जी
बैठे
पहाड़ों
को
गले
लग
कर
नदी
बैठे
तुम्हारी
लत
भला
कैसी
लगी
हमको
जो
हम
इक
घूॅंट
में
ये
रात
पी
बैठे
उन्हें
आभास
कैसे
हो
मुहब्बत
जो
नहीं
गंगा
किनारे
पर
कभी
बैठे
हैं
हम
जिस
मोड़
पर
है
वो
बहुत
नाज़ुक
ज़रूरी
है
कि
हर
रस्ता
सही
बैठे
भले
बैठा
न
बैठा
तू
मिरे
दर
पर
तिरे
दर
पर
मगर
हरदम
अली
बैठे
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Krishna Mishra
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