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Krishna Mishra
hamne teri yaad ko zariya banaa rakkha hai
hamne teri yaad ko zariya banaa rakkha hai | हमने तेरी याद को ज़रिया बना रक्खा है
- Krishna Mishra
हमने
तेरी
याद
को
ज़रिया
बना
रक्खा
है
याद
जिसने
बूँद
को
दरिया
बना
रक्खा
है
- Krishna Mishra
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यार
तू
जो
पास
आने
लग
गया
है
इश्क़
जैसे
दिल
जलाने
लग
गया
है
है
सँवारा
धूप
ने
तेरी
मुझे
यूँॅं
सबका
ही
दिल
मुझपे
आने
लग
गया
है
ऑंखें
जो
तुझ
सेे
मिलाया
करता
था
वो
ऑंखें
अब
सब
सेे
चुराने
लग
गया
है
था
इरादा
ज़िंदगी
आसान
सी
हो
अब
इरादा
डगमगाने
लग
गया
है
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Krishna Mishra
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ग़ज़ल
ऐसी
कहें
इक
लाश
जी
बैठे
पहाड़ों
को
गले
लग
कर
नदी
बैठे
तुम्हारी
लत
भला
कैसी
लगी
हमको
जो
हम
इक
घूॅंट
में
ये
रात
पी
बैठे
उन्हें
आभास
कैसे
हो
मुहब्बत
जो
नहीं
गंगा
किनारे
पर
कभी
बैठे
हैं
हम
जिस
मोड़
पर
है
वो
बहुत
नाज़ुक
ज़रूरी
है
कि
हर
रस्ता
सही
बैठे
भले
बैठा
न
बैठा
तू
मिरे
दर
पर
तिरे
दर
पर
मगर
हरदम
अली
बैठे
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Krishna Mishra
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ख़ुद
तो
क्यूँ
गुमनाम
थे
गर
करना
ही
था
इश्क़
था
जो
जान
को
तरदीद
क्या
दें
मरना
ही
था
इश्क़
था
जो
Krishna Mishra
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सिलसिला
इश्क़
का
ऐसा
है
सम्म
है
पर
सुधा
जैसा
है
आशना
बे-वफ़ा
है
मगर
ऐसा
है
वो
ख़ुदा
जैसा
है
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Krishna Mishra
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जाने
कौन
ज़माने
की
मुझको
ये
हवा
लगी
है
ये
हर
वक़्त
भला
बनने
की
कैसी
अदा
लगी
है
मैंने
इश्क़
के
मारे
लड़कों
को
बावला
कहा
बस
ऐसा
खेल
हुआ
मेरी
मुझको
बद्दुआ
लगी
है
है
बस
एक
ही
मुट्ठी
के
जितना
दिल
जिसे
न
जाने
दुनिया
मुट्ठी
में
करने
की
आख़िर
ऐसी
क्या
लगी
है
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Krishna Mishra
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