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Ankur Mishra
rishta ye sach men tod do
rishta ye sach men tod do | रिश्ता ये सच में तोड़ दो
- Ankur Mishra
रिश्ता
ये
सच
में
तोड़
दो
सारी
थकन
अब
छोड़
दो
हासिल
नहीं
कुछ
भी
तुम्हें
पन्ना
बदन
का
मोड़
दो
क्या
जाने
कब
आए
वो
अब
ये
आइने
तुम
फोड़
दो
हम
सेे
वफ़ा
होती
नहीं
उम्मीद
ये
तुम
छोड़
दो
मर
जाएँगे
हम
ऐसे
ही
हम
से
हमें
बस
जोड़
दो
- Ankur Mishra
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ये
आँसू
ढूँडता
है
तेरा
दामन
मुसाफ़िर
अपनी
मंज़िल
जानता
है
Asad Bhopali
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बिछड़ते
वक़्त
भी
हिम्मत
नहीं
जुटा
पाया
कभी
भी
उस
को
गले
से
नहीं
लगा
पाया
किसी
को
चाहते
रहने
की
सज़ा
पाई
है
मैं
चार
साल
में
लड़की
नहीं
पटा
पाया
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Shadab Asghar
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चला
है
जोश
में
मक़्तल
की
ओर
जोशीला
उसी
को
देख
के
कितनों
को
अक़्ल
आई
है
Tarun Bharadwaj
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ज़माना
इश्क़
के
मारों
को
मात
क्या
देगा
दिलों
के
खेल
में
ये
जीत
हार
कुछ
भी
नहीं
Akhtar Saeed Khan
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ऐसा
नहीं
कि
उन
से
मोहब्बत
नहीं
रही
जज़्बात
में
वो
पहली
सी
शिद्दत
नहीं
रही
Khumar Barabankvi
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ज़िद
हर
इक
बात
पर
नहीं
अच्छी
दोस्त
की
दोस्त
मान
लेते
हैं
Dagh Dehlvi
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मुझे
दुश्मन
से
भी
ख़ुद्दारी
की
उम्मीद
रहती
है
किसी
का
भी
हो
सर
क़दमों
में
सर
अच्छा
नहीं
लगता
Javed Akhtar
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यार
आसान
होती
नहीं
यह
कला
मौन
रहना
बड़ी
ही
चुनौती
रही
Aniket sagar
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हिम्मत,
ताकत,
प्यार,
भरोसा
जो
है
सब
इनसे
ही
है
कुछ
नंबर
हैं
जिन
पर
मैंने
अक्सर
फोन
लगाया
है
Pratap Somvanshi
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हासिल
न
कर
पाया
तुझे
मैं
मिन्नतों
के
बाद
भी
उम्मीद
सेंटा
से
लगाना
लाज़मी
भी
है
मिरा
Harsh saxena
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जिस्म
से
रूह
तक
का
सफ़र
है
लौट
आओ
मोहब्बत
अगर
है
उड़
गए
शाखों
से
वो
परिंदे
दिल
तिरा
जिनका
महफ़ूज़
घर
है
साथ
चलने
का
था
वा'दा
तेरा
अब
झुकी
क्यूँ
तिरी
ये
नज़र
है
दिल
परिंदा
बना
उड़ता
है
पर
इश्क़
मंज़िल
नहीं
ये
ख़बर
है
लौट
आता
हूँ
मैं
तन्हा
वापस
सूनी
हर
डाली
सूना
शजर
है
पास
तस्वीर
है
उसकी
लेकिन
दूर
मुझ
सेे
बहुत
वो
बशर
है
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Ankur Mishra
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दर-ब-दर
बेज़ार
सा
था
ख़ाली
मैं
इतवार
सा
था
भर
गए
थे
ज़ख़्म
लेकिन
फिर
भी
मैं
बीमार
सा
था
जाने
किसकी
थी
ये
साज़िश
कौन
वो
अय्यार
सा
था
पास
सब
था
मेरे
पर
मैं
लगता
क्यूँ
अशरार
सा
था
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Ankur Mishra
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नाम
अब
उसका
बताने
से
रहे
हम
ये
पर्दा
अब
उठाने
से
रहे
एक
मुद्दत
तक
तलाशा
है
उसे
कर्ज़
कोई
हम
चुकाने
से
रहे
आके
ले
ले
कोई
चाहे
इम्तिहान
हम
कोई
पर्चा
दिखाने
से
रहे
हमनें
सब
सेे
ही
रखा
है
फ़ासला
तुम
हमें
अब
आज़माने
से
रहे
हम
निकल
आए
हैं
उस
दर
से
भी
अब
हम
वफ़ा
तुम
सेे
निभाने
से
रहे
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Ankur Mishra
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चंद
क़तरों
से
गुज़ारा
कर
लिया
हमने
दरिया
से
किनारा
कर
लिया
करने
आई
तब
तकाज़ा
ज़िंदगी
मौत
ने
जब
काम
सारा
कर
लिया
किस
तरह
माँगूँ
ख़ुदास
अब
उसे
मैंने
मेरा
जब
सहारा
कर
लिया
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Ankur Mishra
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फिर
उसी
की
प्यास
में
थे
ज़िंदगी
की
आस
में
थे
हम
कभी
ऐ
हम-नशीं
उस
हम-नवा
के
ख़ास
में
थे
फ़ासलों
से
राब्तों
तक
दर्द
ही
अहसास
में
थे
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Ankur Mishra
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