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Ankur Mishra
log kaanton se vafaa karte nahin
log kaanton se vafaa karte nahin | लोग काँटों से वफ़ा करते नहीं
- Ankur Mishra
लोग
काँटों
से
वफ़ा
करते
नहीं
ख़ुद
को
ज़ाहिर
बा-ख़ुदा
करते
नहीं
बीत
जाती
है
अकेले
उम्र
पर
राब्तों
से
राब्ता
करते
नहीं
आज़माते
हैं
मोहब्बत
को
बशर
और
कहते
हैं
दग़ा
करते
नहीं
- Ankur Mishra
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कितनी
उल्फ़त
थी
कितनी
वफ़ा
है
अब
भी
तेरा
वही
रास्ता
है
ढूँढता
है
किसे
दर-ब-दर
तू
कैसा
ये
दर्द
कैसी
दवा
है
उम्र
भर
मैं
रहा
साथ
जिसके
साया
वो
अब
कहीं
लापता
है
है
यक़ीं
अब
भी
मुझपे
उसे
पर
शख़्स
वो
यार
पागल
बड़ा
है
लौटा
है
जब
से
वो
उस
गली
से
जान
देने
पे
'अंकुर'
अड़ा
है
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हमने
रो
के
शब
गुज़ारी
है
यादों
की
इतनी
उधारी
है
कर
लूँ
कैसे
ख़ुद-कुशी
यूँँ
ही
जान
भी
तो
ये
तुम्हारी
है
हक़
है
तुझको
छोड़
जाए
तू
रात
काली
अब
हमारी
है
मुझको
है
मालूम
हर
रस्ता
इश्क़
भी
ये
रोग
भारी
है
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कोई
रहता
नहीं
फिर
भी
भरा
सा
ही
है
लगता
सच
तेरी
यादों
से
घर
अब
भी
हरा
सा
ही
है
लगता
सच
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Ankur Mishra
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देख
हँसता
मुझे
ज़िंदगी
पर
रो
पड़ा
आइना
बेबसी
पर
साथ
रहता
था
मेरे
कभी
वो
पास
उसके
है
ग़म
वो
अभी
पर
दोस्त
दुश्मन
सभी
याद
आए
याद
आया
न
मुझको
मैं
ही
पर
जान
लेती
नहीं
मौत
भी
अब
है
यक़ीं
इस
क़दर
ज़िंदगी
पर
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हमपे
भी
अब्र-ए-करम
हो
दर्द
हो
पर
थोड़ा
कम
हो
थक
गया
हूँ
रोते
रोते
आँख
थोड़ी
तो
ये
नम
हो
खो
दिया
है
ख़ुद
को
मैंने
ख़त्म
अब
तो
ये
सितम
हो
मुद्दतों
लौटा
नहीं
वो
क्या
मोहब्बत
क्या
भरम
हो
टूट
जाए
इस
सेे
पहले
पूरी
अंकुर
इक
क़सम
हो
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Ankur Mishra
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