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Ankur Mishra
koii usko ye paighaam de
koii usko ye paighaam de | कोई उसको ये पैग़ाम दे
- Ankur Mishra
कोई
उसको
ये
पैग़ाम
दे
सब्र
का
मेरे
वो
दाम
दे
थक
गया
हूँ
मैं
इन
वादों
से
और
मुझपे
न
इल्ज़ाम
दे
है
क़सम
तुझको
जानाँ
मिरी
याद
आए
तू
वो
नाम
दे
एक
अर्सा
हुआ
जागते
अब
तो
कोई
हसीं
शाम
दे
जल
रहा
है
तिरी
याद
में
दिल
को
थोड़ा
तो
आराम
दे
- Ankur Mishra
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छुप
कर
नज़ारा
करते
हैं
उस
को
पुकारा
करते
हैं
आए
न
आए
वो
मगर
हम
तो
इशारा
करते
हैं
वाक़िफ़
हूँ
मैं
हर
मर्म
से
उल्फ़त
दुबारा
करते
हैं
वो
आज़माए
तो
सही
हम
भी
ख़सारा
करते
हैं
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रोए
फिर
हँसकर
दिखाना
ही
पड़ा
हम
भी
ज़िंदा
हैं
बताना
ही
पड़ा
दर्द
हो
जाए
न
तन्हा
इसलिए
भूल
के
सब
मुस्कुराना
ही
पड़ा
रंग
इतने
थे
ज़माने
में
मगर
मय
को
पानी
से
मिलाना
ही
पड़ा
इक
तमन्ना
की
थी
मैंने
और
बस
हाथ
ज़ख़्मों
से
हटाना
ही
पड़ा
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ख़ुद
से
जो
हम
बेख़बर
रहने
लगे
थे
अश्क
इन
आँखों
से
फिर
बहने
लगे
थे
करते
क्या
शिकवा
किसी
से
हम
यहाँ
अब
तंज़
सारे
हम
ही
जब
सहने
लगे
थे
बाद
बरसों
के
तो
आया
था
ये
लम्हा
बाद
बरसों
के
वो
कुछ
कहने
लगे
थे
ख़्वाह
मख़ाह
ही
छोड़
आया
शहर
वो
मैं
यार
अब
तो
दिल
में
वो
रहने
लगे
थे
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आँख
में
जो
ठहरा
पानी
है
बस
यही
अब
इक
निशानी
है
जंग
मैं
हारा
नहीं
लेकिन
दूर
मुझ
सेे
मेरी
रानी
है
जाम
शायद
आख़िरी
है
ये
आख़िरी
ही
ज़िंदगानी
है
दिल
अभी
तो
टूटा
है
जानाँ
क्यूँ
अभी
मय्यत
उठानी
है
चंद
लम्हें
हैं
अभी
बाक़ी
साँसों
में
थोड़ी
जवानी
है
फ़ासला
इतना
नहीं
अच्छा
एक
सी
अपनी
कहानी
है
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रखते
क्यूँ
राब्ता
बाग़बाँ
से
लोग
वाक़िफ़
थे
फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ
से
सूख
जाते
हैं
शाख़ों
पे
पत्ते
टूट
जाते
हैं
कार-ए-जहाँ
से
इसलिए
जान
देनी
पड़ी
फिर
जान
जाए
न
अस्र-ए-रवाँ
से
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