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Ankur Mishra
khidkiyaan aaine daraaron se
khidkiyaan aaine daraaron se | खिड़कियाँ आइने दरारों से
- Ankur Mishra
खिड़कियाँ
आइने
दरारों
से
हूँ
परेशाँ
मैं
इन
किनारों
से
प्यास
तेरी
मुझे
न
भर
दे
फिर
सोचता
हूँ
कहीं
शरारों
से
ढूँढने
आसमाँ
वो
निकला
है
पूछता
है
पता
सितारों
से
- Ankur Mishra
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ख़ाली
कमरा
रौशनी
दीवार
से
मैं
भी
डरता
हूँ
फ़िराक़-ए-यार
से
बे-वफ़ा
कह
तो
दिया
सबने
मगर
हाल
कोई
पूछे
इस
बीमार
से
बोतलो
में
बंद
है
क़िस्मत
मिरी
रंज
है
मुझको
मिरी
तलवार
से
मुद्दतों
से
क़ैद
हूँ
मैं
ख़ुद
में
ही
लग
रही
है
चोट
क़ल्ब-ए-ज़ार
से
शौक़
था
जानाँ
कभी
मुझको
भी
पर
थक
गया
हूँ
अब
मैं
भी
इस
प्यार
से
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मुस्कुराने
की
जो
आदत
है
छोड़
दो
हाकिम
बुरी
लत
है
डूब
जाएँगे
वो
सहरा
में
प्यास
ये
जिनकी
बदौलत
है
इन
अँधेरों
से
चराग़ों
का
इस
तरह
मिलना
कयामत
है
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तिश्नगी
में
तिरी
दर-ब-दर
सा
हो
गया
हूँ
चराग़-ए-सहर
सा
क्या
ख़बर
डूब
जाऊँ
कहाँ
मैं
जल
रहा
हूँ
सनम
दोपहर
सा
सम्त
जाते
हुए
उन
लबों
के
मैं
भी
बिखरा
था
मौज़-ए-गुहर
सा
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उम्र
भर
ये
ख़ुमारी
रहेगी
रात
हम
पे
ये
तारी
रहेगी
छोड़
दी
है
मोहब्बत
मगर
ये
आँख
अब
यूँँ
ही
ख़ारी
रहेगी
मैं
करूँँ
क्या
गिला
अब
किसी
से
जंग
ख़ुद
से
ये
जारी
रहेगी
हम
सेे
हैं
वो
ख़फ़ा
फिर
भी
अंकुर
उन
सेे
क़ाएम
ये
यारी
रहेगी
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इन
अँधेरों
से
डर
लगता
है
दूर
पर
अब
वो
दर
लगता
है
लौट
आती
है
जाके
हवा
ख़ाली
ख़ाली
वो
घर
लगता
है
मैं
करूँँ
कैसे
उस
पे
यक़ीं
हसरतों
से
वो
तर
लगता
है
शोर
इतना
है
अंदर
कि
अब
अब
ख़मोशी
से
डर
लगता
है
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