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Ankur Mishra
KHaamushi kii maar hain ham
KHaamushi kii maar hain ham | ख़ामुशी की मार हैं हम
- Ankur Mishra
ख़ामुशी
की
मार
हैं
हम
दर-ब-दर
बेज़ार
हैं
हम
थाम
लो
बाहों
में
अपनी
थोड़े
से
बीमार
हैं
हम
तू
ही
अपना
है
हमारा
तेरे
पहरेदार
हैं
हम
है
ख़ुदा
माना
तुझे
फिर
ग़म
से
क्यूँ
दो
चार
हैं
हम
है
तू
बाक़ी
हम
में
अब
भी
कश्ती
तू
पतवार
हैं
हम
- Ankur Mishra
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एक
दिन
मेरी
ख़ामुशी
ने
मुझे
लफ़्ज़
की
ओट
से
इशारा
किया
Anjum Saleemi
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ग़लत
बातों
को
ख़ामोशी
से
सुनना
हामी
भर
लेना
बहुत
हैं
फ़ाएदे
इस
में
मगर
अच्छा
नहीं
लगता
Javed Akhtar
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मेरे
मिज़ाज
की
उसको
ख़बर
नहीं
रही
है
ये
बात
मेरे
गले
से
उतर
नहीं
रही
है
ये
रोने-धोने
का
नाटक
तवील
मत
कर
अब
बिछड़
भी
जाए
तू
मुझ
सेे
तो
मर
नहीं
रही
है
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Ashutosh Vdyarthi
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उसे
बेचैन
कर
जाऊँगा
मैं
भी
ख़मोशी
से
गुज़र
जाऊँगा
मैं
भी
Ameer Qazalbash
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ख़ामुशी
से
हुई
फ़ुग़ाँ
से
हुई
इब्तिदा
रंज
की
कहाँ
से
हुई
Ada Jafarey
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ग़लत
बातों
को
ख़ामोशी
से
सुनना
हामी
भर
लेना
बहुत
हैं
फ़ाएदे
इस
में
मगर
अच्छा
नहीं
लगता
Javed Akhtar
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तकल्लुफ़
छोड़कर
आओ
उसे
फिर
से
जिया
जाए
हमारा
बचपना
जो
एल्बमों
में
क़ैद
रहता
है
Shiva awasthi
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यार
सब
जम्अ'
हुए
रात
की
ख़ामोशी
में
कोई
रो
कर
तो
कोई
बाल
बना
कर
आया
Ahmad Mushtaq
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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ये
पानी
ख़ामुशी
से
बह
रहा
है
इसे
देखें
कि
इस
में
डूब
जाएँ
Ahmad Mushtaq
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ख़ुश
हूँ
तेरी
हर
ख़ुशी
में
ज़िंदा
हूँ
इस
बेकसी
में
माना
है
तू
ख़्वाब
बस
इक
कह
दूँ
पर
सच
क्या
सही
में
इक
तू
ही
था
अपना
मेरा
और
था
क्या
ज़िंदगी
में
छोड़
जाने
वाले
मुझको
ख़ुश
है
क्या
तू
भी
सही
में
माना
हूँ
काफ़िर
मगर
मैं
रहता
है
तू
बंदगी
में
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Ankur Mishra
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फिर
कहीं
राह-ए-रज़ा
में
खो
न
जाऊँ
इस
अना
में
देखता
हूँ
रोज़
ख़ुद
को
डूबते
बहर-ए-फ़ना
में
है
सजी
दुल्हन
सी
फिर
क्यूँ
रात
ये
आब-ए-हया
में
ढल
रही
है
किसलिए
ये
चाँदनी
अंकुर
सबा
में
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Ankur Mishra
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हमपे
भी
अब्र-ए-करम
हो
दर्द
हो
पर
थोड़ा
कम
हो
थक
गया
हूँ
रोते
रोते
आँख
थोड़ी
तो
ये
नम
हो
खो
दिया
है
ख़ुद
को
मैंने
ख़त्म
अब
तो
ये
सितम
हो
मुद्दतों
लौटा
नहीं
वो
क्या
मोहब्बत
क्या
भरम
हो
टूट
जाए
इस
सेे
पहले
पूरी
अंकुर
इक
क़सम
हो
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Ankur Mishra
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इस
क़दर
भी
आज़माया
है
नाम
से
उसके
बुलाया
है
छोड़
दूँ
कैसे
वो
रस्ता
मैं
घर
ये
मुश्किल
से
बनाया
है
आज
भी
हूँ
याद
मैं
उसको
डाकिया
ख़त
जिसका
लाया
है
अब
करें
क्या
शिकवा
हम
उस
सेे
कौन
सा
हमने
निभाया
है
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Ankur Mishra
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नज़रों
से
दिल
पे
वार
कर
है
इश्क़
तो
इज़हार
कर
कब
तक
बहेगा
आँख
से
दरिया
कभी
तो
पार
कर
आसाँ
नहीं
ये
आशिक़ी
कोई
नया
व्यापार
कर
बस
जीतने
वाला
था
मैं
कहते
हैं
सब
ये
हार
कर
सब
कुछ
गँवा
कर
आया
हूँ
ख़ातिर
तिरी
अब
प्यार
कर
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Ankur Mishra
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