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Ankur Mishra
har shab usii dar pe thehar jaate hain ham
har shab usii dar pe thehar jaate hain ham | हर शब उसी दर पे ठहर जाते हैं हम
- Ankur Mishra
हर
शब
उसी
दर
पे
ठहर
जाते
हैं
हम
देते
हुए
रस्ता
गुज़र
जाते
हैं
हम
है
रब्त
हमको
इन
चराग़ों
से
मगर
बस
ज़िंदगी
की
लौ
से
डर
जाते
हैं
हम
आसाँ
नहीं
माना
मगर
ऐ
ज़िंदगी
कर
के
जमा
ख़ुद
को
बिख़र
जाते
हैं
हम
- Ankur Mishra
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अपनी
आदत
के
मुताबिक़
चल
रहें
हैं
आज
भी
हम
पहले
सा
ही
जल
रहें
हैं
आँखों
में
अब
तक
वही
सूरत
बसी
है
लगता
है
हम
जैसे
ख़ुद
को
छल
रहें
हैं
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दे
रहा
था
सभी
को
दिलासा
सर
उठाए
मैं
अपना
जनाज़ा
किस
तरह
आज़माऊँ
उसे
फिर
ख़्वाब
है
जो
मिरी
ख़्वाहिशों
का
बे-सबब
बे-वजह
पूछते
हो
आइने
से
पता
आदमी
का
रात
भर
तिश्नगी
में
किसी
की
यार
जलता
रहा
जुगनुओं
सा
एक
मुद्दत
हुई
जागते
अब
चाँद
तारों
की
सफ़
ज़िंदगी
आ
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आख़िरी
ख़त
आख़िरी
पैग़ाम
है
मुझ
पे
मेरे
क़त्ल
का
इल्ज़ाम
है
सो
गए
मुझको
जगा
के
ख़्वाब
भी
किस
क़दर
तन्हा
ये
सुब्ह-ओ-शाम
है
ख़ामख़ाँ
करता
रहा
फ़रियाद
मैं
दर्द
देना
ही
तो
उसका
काम
है
जुर्म
साबित
हो
नहीं
पाया
कभी
मय-कदों
में
आना
जाना
आम
है
थी
मोहब्बत
यूँँ
तो
उसको
भी
मगर
नाम
'अंकुर'
बस
मिरा
बदनाम
है
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ख़्वाब
आँखों
को
मेरे
गवारा
नहीं
इसलिए
एक
क़तरा
भी
ख़ारा
नहीं
दूर
तक
है
सनम
ख़्वाहिशों
का
जहाॅं
ये
ज़मीं
आसमाॅं
का
किनारा
नहीं
जल
उठे
हैं
तिरी
धूप
से
ज़िंदगी
वो
दिए
कोई
जिनका
सहारा
नहीं
क़त्ल
होना
है
फ़ितरत
में
उसकी
बशर
दोष
इस
में
ज़रा
भी
हमारा
नहीं
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थोड़ी
ख़ुमारी
रहने
दो
आदत
तुम्हारी
रहने
दो
हम
छोड़
देंगे
ख़ुद
को
भी
ये
दम
शुमारी
रहने
दो
मिल
जाए
शायद
कुछ
तुम्हें
बातें
हमारी
रहने
दो
लौटा
दो
यादें
वो
मेरी
रातें
तुम्हारी
रहने
दो
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