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Ankur Mishra
fasla un labon se badhaate hue
fasla un labon se badhaate hue | फ़ासला उन लबों से बढ़ाते हुए
- Ankur Mishra
फ़ासला
उन
लबों
से
बढ़ाते
हुए
बुझ
गया
आग
मैं
वो
जलाते
हुए
आइने
में
है
चेहरा
किसी
ग़ैर
का
थक
गया
हूँ
यक़ीं
ये
दिलाते
हुए
चूमना
चाहती
है
ज़मीं
ये
बदन
दफ़्न
होना
है
ख़ुद
को
जगाते
हुए
शाम
ढलती
है
लेकर
सहर
का
पता
रात
आती
है
शबनम
गिराते
हुए
इन
गुलों
से
न
रख
राब्ता
ऐ
सनम
ज़ख़्म
देंगे
ये
नज़रें
मिलाते
हुए
- Ankur Mishra
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बेसबब
ही
नहीं
आइना
रखता
हूँ
मैं
भी
रिंदों
से
अब
राब्ता
रखता
हूँ
याद
आती
रहे
तेरी
पल
पल
मुझे
इसलिए
ज़ख़्मों
को
मैं
हरा
रखता
हूँ
ढूॅंढ
लेता
है
जाने
वो
कैसे
मुझे
मैं
तो
मुझ
सेे
बहुत
फ़ासला
रखता
हूँ
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Ankur Mishra
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इश्क़
में
अब
ख़सारे
बहुत
हैं
इस
नदी
के
किनारे
बहुत
हैं
छोड़
के
जाएँ
कैसे
उसे
हम
पन्ने
उल्फ़त
के
खारे
बहुत
हैं
ले
न
जाए
चुरा
उसको
कोई
आसमाँ
में
सितारे
बहुत
हैं
कैसे
देखूँ
मैं
अब
आइना
ये
ज़ख़्म
इस
में
हमारे
बहुत
हैं
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Ankur Mishra
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थोड़ी
ख़ुमारी
रहने
दो
आदत
तुम्हारी
रहने
दो
हम
छोड़
देंगे
ख़ुद
को
भी
ये
दम
शुमारी
रहने
दो
मिल
जाए
शायद
कुछ
तुम्हें
बातें
हमारी
रहने
दो
लौटा
दो
यादें
वो
मेरी
रातें
तुम्हारी
रहने
दो
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Ankur Mishra
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रंग
अब
वो
उतरने
लगा
है
ज़ख़्म
फिर
से
वो
भरने
लगा
है
छोड़
दो
याद
आना
हमें
तुम
कोई
हम
पे
भी
मरने
लगा
है
कैसे
जाऊँ
मैं
फिर
उस
गली
अब
दिल
बड़ा
अब
ये
डरने
लगा
है
राब्ता
उसका
है
हम
सेे
वो
पर
बात
ग़ैरों
से
करने
लगा
है
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Ankur Mishra
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ख़ुद
से
ही
जैसे
अंजान
थे
घर
में
अपने
ही
मेहमान
थे
पूछते
हो
पता
जिसका
तुम
हम
कभी
उसकी
पहचान
थे
देख
कर
मुझको
यूँँ
हारते
जीतने
वाले
हैरान
थे
मिल
न
पाए
दुबारा
कभी
रास्ते
वो
जो
आसान
थे
ख़ुद-कुशी
सोचा
कर
लूँ
मगर
सैकड़ों
दिल
में
अरमान
थे
छोड़
आया
उसे
तन्हा
ही
जिसकी
ख़ातिर
परेशान
थे
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Ankur Mishra
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