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Ankur Mishra
besabab hi nahin aaina rakhta hooñ
besabab hi nahin aaina rakhta hooñ | बेसबब ही नहीं आइना रखता हूँ
- Ankur Mishra
बेसबब
ही
नहीं
आइना
रखता
हूँ
मैं
भी
रिंदों
से
अब
राब्ता
रखता
हूँ
याद
आती
रहे
तेरी
पल
पल
मुझे
इसलिए
ज़ख़्मों
को
मैं
हरा
रखता
हूँ
ढूॅंढ
लेता
है
जाने
वो
कैसे
मुझे
मैं
तो
मुझ
सेे
बहुत
फ़ासला
रखता
हूँ
- Ankur Mishra
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लोग
काँटों
से
वफ़ा
करते
नहीं
ख़ुद
को
ज़ाहिर
बा-ख़ुदा
करते
नहीं
बीत
जाती
है
अकेले
उम्र
पर
राब्तों
से
राब्ता
करते
नहीं
आज़माते
हैं
मोहब्बत
को
बशर
और
कहते
हैं
दग़ा
करते
नहीं
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Ankur Mishra
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एक
तू
और
तेरी
कमी
से
है
अँधेरा
बहुत
रौशनी
से
किस
तरह
कोई
वा'दा
निभाऊँ
जान
जाती
नहीं
ख़ुद-कुशी
से
ज़ुर्म
को
ज़ुर्म
साबित
करे
क्यूँ
क्यूँ
करें
हम
मोहब्बत
तुझी
से
है
लकीरों
में
ही
फ़ासला
जब
किसलिए
दिल-लगी
ज़िंदगी
से
क़त्ल
होना
है
फ़ितरत
में
मेरी
ये
बताना
है
'अंकुर'
किसी
से
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Ankur Mishra
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जैसे
तैसे
गुज़र
तो
रही
है
ज़िंदगी
ये
सँवर
तो
रही
है
है
गिला
उसको
माना
मगर
ये
आँख
जुर्माना
भर
तो
रही
है
हम
सेे
मत
पूछो
अब
नाम
उसका
रात
इक़रार
कर
तो
रही
है
कब
से
बैठा
हूँ
बद-हाल
मैं
पर
याद
उसकी
निख़र
तो
रही
है
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Ankur Mishra
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ख़ाली
कमरा
रौशनी
दीवार
से
मैं
भी
डरता
हूँ
फ़िराक़-ए-यार
से
बे-वफ़ा
कह
तो
दिया
सबने
मगर
हाल
कोई
पूछे
इस
बीमार
से
बोतलो
में
बंद
है
क़िस्मत
मिरी
रंज
है
मुझको
मिरी
तलवार
से
मुद्दतों
से
क़ैद
हूँ
मैं
ख़ुद
में
ही
लग
रही
है
चोट
क़ल्ब-ए-ज़ार
से
शौक़
था
जानाँ
कभी
मुझको
भी
पर
थक
गया
हूँ
अब
मैं
भी
इस
प्यार
से
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Ankur Mishra
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टूटते
हैं
बिखर
जाते
हैं
साँस
लेते
ही
मर
जाते
हैं
साथ
इक
शब
नहीं
गुज़री
पर
वा'दा
'उम्रों
का
कर
जाते
हैं
जिस
तरह
नम
हैं
आँखें
मिरी
लोग
सपनों
से
डर
जातें
हैं
ज़ख़्म
पे
ज़ख़्म
देते
रहो
चेहरे
कुछ
बन
सँवर
जाते
हैं
दूर
है
शहर
उसका
अभी
लौट
कर
हम
भी
घर
जाते
हैं
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Ankur Mishra
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