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Ankur Mishra
dheere dheere hi magar parvaaz kar
dheere dheere hi magar parvaaz kar | धीरे धीरे ही मगर परवाज़ कर
- Ankur Mishra
धीरे
धीरे
ही
मगर
परवाज़
कर
आसमाॅं
तेरा
है
तू
आग़ाज़
कर
इन
लकीरों
में
नहीं
क़िस्मत
तिरी
खोल
मुठ्ठी
और
चल
आवाज़
कर
मिट
यूँँ
जाएगा
तिरा
नाम-ओ-निशा
ख़ुद
पे
भी
ज़ाहिर
न
कोई
राज़
कर
उम्र
भर
का
है
सफ़र
ये
ज़िंदगी
सोए
ख़्वाबों
का
न
यूँँ
नाराज़
कर
ज़ख़्म
गहरे
हैं
तिरे
माना
मगर
दर्द
से
ही
दर्द
का
आग़ाज़
कर
- Ankur Mishra
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मुतमइन
सारा
ज़माना
है
मुख़्तसर
अपना
ठिकाना
है
घोंट
दे
साँसें
न
दम
जानाँ
सहरा
सहरा
गुल
खिलाना
है
चंद
लम्हें
चंद
रातें
बस
और
साहिब
क्या
बहाना
है
सिलवटें
पड़ने
लगी
हैं
फिर
ज़र्फ़
अपना
आज़माना
है
ज़िंदगी
से
आख़िरी
'अंकुर'
मौत
को
रिश्ता
निभाना
है
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तुम
भी
हम
सेे
सवाल
करते
हो
यार
तुम
भी
कमाल
करते
हो
छीन
कर
ख़्वाब
मेरी
आँखों
से
आँखें
क्यूँ
अपनी
लाल
करते
हो
कट
गई
हिज्र
में
हमारी
भी
किसलिए
अब
मलाल
करते
हो
चूम
लेता
हूँ
हर
वो
शय
मैं
अब
जिस
तरफ़
अपना
गाल
करते
हो
आज
भी
है
ख़याल
उसका
ही
जिसका
अंकुर
ख़याल
करते
हो
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फिर
दुबारा
ज़ख़्म
खा
कर
छुप
गए
ख़ुद
को
छुपा
कर
एक
अरसे
से
हैं
तन्हा
अश्क
आँखों
में
दु'आ
कर
हो
रही
हैं
ख़र्च
यादें
हम-नशीं
रो
कर
रुला
कर
कर
गया
बंजर
लबों
को
तितलियों
को
वो
उड़ा
कर
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रोए
फिर
हँसकर
दिखाना
ही
पड़ा
हम
भी
ज़िंदा
हैं
बताना
ही
पड़ा
दर्द
हो
जाए
न
तन्हा
इसलिए
भूल
के
सब
मुस्कुराना
ही
पड़ा
रंग
इतने
थे
ज़माने
में
मगर
मय
को
पानी
से
मिलाना
ही
पड़ा
इक
तमन्ना
की
थी
मैंने
और
बस
हाथ
ज़ख़्मों
से
हटाना
ही
पड़ा
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ख़्वाब
कोई
नया
बो
नहीं
पाए
हम
पिछली
दो
रातों
से
सो
नहीं
पाए
हम
चाहा
तो
भूल
जाएँ
उसे
हम
मगर
चाह
कर
भी
कभी
रो
नहीं
पाए
हम
दर्द
होता
है
अब
याद
कर
ख़ुद
को
पर
साँस
तक
अपनी
इक
ढो
नहीं
पाए
हम
सैकड़ों
बार
मिलना
हुआ
उन
सेे
पर
एक
दोबारा
फिर
हो
नहीं
पाए
हम
जैसे
तैसे
बचाया
था
ख़ुद
को
मगर
दाग़
वो
इश्क़
का
धो
नहीं
पाए
हम
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