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Ankur Mishra
phir dobaara zaKHm kha kar
phir dobaara zaKHm kha kar | फिर दुबारा ज़ख़्म खा कर
- Ankur Mishra
फिर
दुबारा
ज़ख़्म
खा
कर
छुप
गए
ख़ुद
को
छुपा
कर
एक
अरसे
से
हैं
तन्हा
अश्क
आँखों
में
दु'आ
कर
हो
रही
हैं
ख़र्च
यादें
हम-नशीं
रो
कर
रुला
कर
कर
गया
बंजर
लबों
को
तितलियों
को
वो
उड़ा
कर
- Ankur Mishra
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हादसा
ये
गवारा
न
होगा
ऐसे
तो
अब
गुज़ारा
न
होगा
लौट
जाओ
सुनो
तुम
भी
वापस
इश्क़
फिर
अब
दोबारा
न
होगा
भर
चुके
हैं
वो
अब
ज़ख़्म
सारे
दिल
कभी
ये
तुम्हारा
न
होगा
छोड़
दो
हाथ
मेरा
ये
'अंकुर'
अब
यहाँ
वो
नज़ारा
न
होगा
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उसे
भी
किसी
से
मोहब्बत
नहीं
हमें
भी
हमारी
ज़रूरत
नहीं
बिखरने
लगे
हैं
मिरी
आँख
से
वो
मोती
मुझे
जिनकी
चाहत
नहीं
इरादा
था
कुछ
और
मेरा
मगर
वो
कहता
है
अच्छी
ये
आदत
नहीं
लबों
से
लबों
पे
हो
दस्तक
कोई
गले
से
लगाना
मोहब्बत
नहीं
शब-ए-हिज्र
भी
ये
गुज़र
जाएगी
मुझे
तुझ
सेे
कोई
शिकायत
नहीं
कभी
थी
तमन्ना
मुझे
भी
तिरी
मगर
अब
किसी
की
ज़रूरत
नहीं
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हर
शब
उसी
दर
पे
ठहर
जाते
हैं
हम
देते
हुए
रस्ता
गुज़र
जाते
हैं
हम
है
रब्त
हमको
इन
चराग़ों
से
मगर
बस
ज़िंदगी
की
लौ
से
डर
जाते
हैं
हम
आसाँ
नहीं
माना
मगर
ऐ
ज़िंदगी
कर
के
जमा
ख़ुद
को
बिख़र
जाते
हैं
हम
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Ankur Mishra
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मुश्किलें
थी
बहुत
राहों
में
मुझको
जलना
पड़ा
छाँव
में
पार
कर
लेता
सहरा
मैं
भी
छाला
होता
न
जो
पाँव
में
एक
अरसे
से
हूँ
तन्हा
मैं
पर
वो
आया
न
इन
बाहों
में
हो
यक़ीं
कैसे
अब
उसपे
फिर
ठहरा
ही
जो
नहीं
गाँव
में
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दस्तरस
में
आख़िरी
तस्वीर
है
क्या
दो
घड़ी
की
ज़िंदगी
जागीर
है
क्या
जिन
अँधेरों
से
मिला
था
रौशनी
में
उस
अँधेरे
की
चमकती
पीर
है
क्या
आज़माने
लौट
आई
फिर
दुबारा
यार
ये
बारिश
ही
मेरी
हीर
है
क्या
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