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Ankur Mishra
dar-o-deewar se dar lagta hai ab
dar-o-deewar se dar lagta hai ab | दर-ओ-दीवार से डर लगता है अब
- Ankur Mishra
दर-ओ-दीवार
से
डर
लगता
है
अब
कोई
है
मेरे
अंदर
लगता
है
अब
नज़र
उठती
नहीं
अब
ये
कहीं
पर
ज़मीं
पे
ही
वो
अंबर
लगता
है
अब
करूँँ
कैसे
यक़ीं
मैं
ख़ुद
पे
यारों
बड़ी
मुश्किल
में
अख़्तर
लगता
है
अब
है
ख़्वाहिश
यूँँ
तो
उसकी
मुझको
भी
पर
बहुत
ही
दूर
वो
घर
लगता
है
अब
मिरे
हक़
में
हो
कोई
फ़ैसला
भी
बड़ा
तन्हा
मिरा
दर
लगता
है
अब
- Ankur Mishra
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क्या
है
वो
किसको
ख़बर
है
तुमको
अब
ये
किसका
डर
है
होना
था
जो
हो
चुका
वो
ख़ाली
क्यूँ
फिर
अब
ये
घर
है
रात
भर
सोया
नहीं
मैं
जाने
किसका
ये
असर
है
राब्ता
कैसे
हो
ख़ुद
से
सजदे
में
उसके
ये
सर
है
वो
मिले
तो
उस
सेे
पूछूँ
आँख
क्यूँ
मेरी
ये
तर
है
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हमने
रो
के
शब
गुज़ारी
है
यादों
की
इतनी
उधारी
है
कर
लूँ
कैसे
ख़ुद-कुशी
यूँँ
ही
जान
भी
तो
ये
तुम्हारी
है
हक़
है
तुझको
छोड़
जाए
तू
रात
काली
अब
हमारी
है
मुझको
है
मालूम
हर
रस्ता
इश्क़
भी
ये
रोग
भारी
है
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ज़ख़्म
अपनों
ने
मुझको
दिया
है
इसलिए
दर्द
दिल
से
जुड़ा
है
तिश्नगी
मार
देती
है
लेकिन
तिश्नगी
ने
ही
ज़िंदा
रखा
है
दर-ब-दर
हो
गए
ख़्वाब
सारे
सब्र
से
सब्र
मैंने
किया
है
दूरियाँ
फ़ासलों
से
नहीं
ये
फ़ासला
दूरियों
से
हुआ
है
बेसबब
डर
रहा
था
मैं
अंकुर
मौत
के
पास
सबका
पता
है
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Ankur Mishra
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याद
कोई
पुरानी
कहाँ
है
यार
अब
वो
जवानी
कहाँ
है
मैं
सुना
तो
दूँ
क़िस्सा
वो
लेकिन
पास
कोई
निशानी
कहाँ
है
लौटा
हूँ
जब
से
उन
गलियों
से
मैं
साँसों
में
वो
रवानी
कहाँ
है
मत
करो
ज़िक्र
अब
उसका
'अंकुर'
ये
मुकम्मल
कहानी
कहाँ
है
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Ankur Mishra
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ज़ख़्म
से
बहता
है
रक्त
पर
आँख
भरने
नहीं
देते
हैं
उस
की
ज़द
में
है
घर
मेरा
पर
आग
बुझने
नहीं
देते
हैं
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Ankur Mishra
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