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Ankur Mishra
bewajah besabab to nahin
bewajah besabab to nahin | बेवजह बेसबब तो नहीं
- Ankur Mishra
बेवजह
बेसबब
तो
नहीं
मुझ
में
इतना
अदब
तो
नहीं
माना
है
इश्क़
उस
सेे
मगर
यार
वो
मेरा
रब
तो
नहीं
छोड़
जाए
जिसे
जाना
है
सबको
सबकी
तलब
तो
नहीं
माना
है
ताज़ी
हर
याद
पर
ज़ख़्म
वो
गहरा
अब
तो
नहीं
कब
से
है
वो
ख़फ़ा
मुझ
सेे
पर
उसका
भी
कोई
अब
तो
नहीं
- Ankur Mishra
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खिड़कियाँ
आइने
दरारों
से
हूँ
परेशाँ
मैं
इन
किनारों
से
प्यास
तेरी
मुझे
न
भर
दे
फिर
सोचता
हूँ
कहीं
शरारों
से
ढूँढने
आसमाँ
वो
निकला
है
पूछता
है
पता
सितारों
से
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चुपके
चुपके
यूँँ
नज़ारा
करते
हैं
आँखों
से
उसको
पुकारा
करते
हैं
वो
समझता
ही
नहीं
तो
क्या
करें
रात
भर
हम
तो
इशारा
करते
हैं
उसके
हाथों
में
था
लिखना
मेरा
अब
जिसको
यारों
हम
सँवारा
करते
हैं
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बेसबब
तन्हा
दर-ओ-दीवार
से
रब्त
है
मुझको
मिरे
किरदार
से
ज़ख़्म
पे
रहने
दे
मरहम
हुस्न
का
दर्द
बढ़ता
है
तिरे
दीदार
से
किस
तरह
होगी
मोहब्बत
सर-ब-सर
जीत
जाएँगे
अगर
सब
हार
से
सोचता
हूँ
ख़ाक
जल
जल
के
कहीं
हो
न
जाए
यार
जुगनू
आर
से
ख़ौफ़
था
हमको
बशर
तन्हाई
का
दूर
थे
बस
इसलिए
हम
यार
से
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दूर
सहरा
से
शजर
रखना
कश्तियों
को
बा-ख़बर
रखना
इन
परिंदों
से
हूँ
मैं
वाक़िफ़
इन
परिंदों
पे
नज़र
रखना
ज़िंदगी
की
रह-गुज़र
में
बस
आसमाँ
को
हम-सफ़र
रखना
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जीने
को
ज़ख़्म
ये
काफ़ी
है
कौन
किस
में
यहाँ
बाक़ी
है
छोड़
जातें
हैं
सब
क्यूँ
मुझे
प्यासा
क्यूँ
इतना
ये
साक़ी
है
माना
आसाँ
नहीं
इश्क़
पर
लड़की
वो
थोड़ी
दीवानी
है
कैसे
वा'दा
करूँँ
मैं
कोई
कश्ती
जब
डूब
ही
जानी
है
छोड़
दूँ
सोचा
रस्ता
वो
पर
इश्क़
ने
बात
कब
मानी
है
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