mehram nahin hai tu hi navaa-ha-e-raaz ka | महरम नहीं है तू ही नवा-हा-ए-राज़ का

  - Mirza Ghalib
महरमनहींहैतूहीनवा-हा-ए-राज़का
याँवर्नाजोहिजाबहैपर्दाहैसाज़का
रंग-ए-शिकस्तासुब्ह-ए-बहार-ए-नज़ाराहै
येवक़्तहैशगुफ़्तन-ए-गुल-हा-ए-नाज़का
तूऔरसू-ए-ग़ैरनज़र-हा-ए-तेज़तेज़
मैंऔरदुखतिरीमिज़ा-हा-ए-दराज़का
सर्फ़ाहैज़ब्त-ए-आहमेंमेरावगर्नामें
तोमाहूँएकहीनफ़स-ए-जाँ-गुदाज़का
हैंबस-किजोश-ए-बादासशीशेउछलरहे
हरगोशा-ए-बिसातहैसरशीशा-बाज़का
काविशकादिलकरेहैतक़ाज़ाकिहैहुनूज़
नाख़ुनपेक़र्ज़इसगिरह-ए-नीम-बाज़का
ताराज-ए-काविश-ए-ग़म-ए-हिज्राँहुआ'असद'
सीनाकिथादफ़ीनागुहर-हा-ए-राज़का
  - Mirza Ghalib
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