jis zakham ki ho sakti ho tadbeer rafu ki | जिस ज़ख़्म की हो सकती हो तदबीर रफ़ू की

  - Mirza Ghalib
जिसज़ख़्मकीहोसकतीहोतदबीररफ़ूकी
लिखदीजियोयारबउसेक़िस्मतमेंअदूकी
अच्छाहैसर-अंगुश्त-ए-हिनाईकातसव्वुर
दिलमेंनज़रआतीतोहैइकबूँदलहूकी
क्यूँँडरतेहोउश्शाक़कीबे-हौसलगीसे
याँतोकोईसुनतानहींफ़रियादकिसूकी
दशनेनेकभीमुँहलगायाहोजिगरको
ख़ंजरनेकभीबातपूछीहोगुलूकी
सद-हैफ़वोनाकामकिइकउम्रसे'ग़ालिब'
हसरतमेंरहेएकबुत-ए-अरबदा-जूकी
गोज़िंदगी-ए-ज़ाहिद-ए-बे-चाराअबसहै
इतनाहैकिरहतीतोहैतदबीरवज़ूकी
  - Mirza Ghalib
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