gham-e-duniya se gar paai bhi furqat sar uthaane ki | ग़म-ए-दुनिया से गर पाई भी फ़ुर्सत सर उठाने की

  - Mirza Ghalib
ग़म-ए-दुनियासेगरपाईभीफ़ुर्सतसरउठानेकी
फ़लककादेखनातक़रीबतेरेयादआनेकी
खुलेगाकिसतरहमज़मूँमिरेमक्तूबकाया-रब
क़समखाईहैउसकाफ़िरनेकाग़ज़केजलानेकी
लिपटनापर्नियाँमेंशोला-ए-आतिशकापिन्हाँहै
वलेमुश्किलहैहिकमतदिलमेंसोज़-ए-ग़मछुपानेकी
उन्हेंमंज़ूरअपनेज़ख़्मियोंकादेखआनाथा
उठेथेसैर-ए-गुलकोदेखनाशोख़ीबहानेकी
हमारीसादगीथीइल्तिफ़ात-ए-नाज़परमरना
तिराआनाथाज़ालिममगरतम्हीदजानेकी
लकदकूब-ए-हवादिसकातहम्मुलकरनहींसकती
मिरीताक़तकिज़ामिनथीबुतोंकीनाज़उठानेकी
कहूँक्याख़ूबी-ए-औज़ा-ए-अब्ना-ए-ज़माँ'ग़ालिब'
बदीकीउसनेजिससेहमनेकीथीबार-हानेकी
  - Mirza Ghalib
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