dehr men naqsh-e-wafa vajh-e-tasalli na hua | दहर में नक़्श-ए-वफ़ा वजह-ए-तसल्ली न हुआ

  - Mirza Ghalib
दहरमेंनक़्श-ए-वफ़ावजह-ए-तसल्लीहुआ
हैयेवोलफ़्ज़किशर्मिंदा-ए-मअ'नीहुआ
सब्ज़ा-ए-ख़तसेतिराकाकुल-ए-सरकशदबा
येज़मुर्रदभीहरीफ़-ए-दम-ए-अफ़ईहुआ
मैंनेचाहाथाकिअंदोह-ए-वफ़ासेछूटूँ
वोसितमगरमिरेमरनेपेभीराज़ीहुआ
दिलगुज़रगाह-ए-ख़याल-ए-मय-ओ-साग़रहीसही
गरनफ़सजादा-ए-सर-मंज़िल-ए-तक़्वीहुआ
हूँतिरेवा'दाकरनेमेंभीराज़ीकिकभी
गोशमिन्नत-कश-ए-गुलबाँग-ए-तसल्लीहुआ
किससेमहरूमी-ए-क़िस्मतकीशिकायतकीजे
हमनेचाहाथाकिमरजाएँसोवोभीहुआ
मरगयासदमा-ए-यक-जुम्बिश-ए-लबसे'ग़ालिब'
ना-तवानीसेहरीफ़-ए-दम-ए-ईसीहुआ
हुईहमसेरक़महैरत-ए-ख़त्त-ए-रुख़-ए-यार
सफ़्हा-ए-आइनाजौलाँ-गह-ए-तूतीहुआ
वुसअत-ए-रहमत-ए-हक़देखकिबख़्शाजावे
मुझसाकाफ़िरकिजोममनून-ए-मआसीहुआ
  - Mirza Ghalib
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