kya main bhi pareshaani-e-khaatir se qareen tha | क्या मैं भी परेशानी-ए-ख़ातिर से क़रीं था

  - Meer Taqi Meer
क्यामैंभीपरेशानी-ए-ख़ातिरसेक़रींथा
आँखेंतोकहींथींदिल-ए-ग़म-दीदाकहींथा
किसरातनज़रकीहैसोईचश्मक-ए-अंजुम
आँखोंकेतलेअपनेतोवोमाह-जबींथा
आयातोसहीवोकोईदमकेलिएलेकिन
होंटोंपेमिरेजबनफ़सबाज़-पसींथा
अबकोफ़्तसेहिज्राँकीजहाँतनपेरखाहाथ
जोदर्द-ओ-अलमथासोकहेतूकिवहींथा
जानानहींकुछजुज़ग़ज़लकरकेजहाँमें
कलमेरेतसर्रुफ़मेंयहीक़िता-ए-ज़मींथा
नामआजकोईयाँनहींलेताहैउन्होंका
जिनलोगोंकेकलमुल्कयेसबज़ेर-ए-नगींथा
मस्जिदमेंइमामआजहुआकेवहाँसे
कलतकतोयही'मीर'ख़राबात-नशींथा
  - Meer Taqi Meer
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