bazm men jo tira zuhoor nahin | बज़्म में जो तिरा ज़ुहूर नहीं

  - Meer Taqi Meer
बज़्ममेंजोतिराज़ुहूरनहीं
शम-ए-रौशनकेमुँहपेनूरनहीं
कितनीबातेंबनाकेलाऊँएक
यादरहतीतिरेहुज़ूरनहीं
ख़ूबपहचानताहूँतेरेतईं
इतनाभीतोमैंबे-शुऊरनहीं
क़त्लहीकरकिउसमेंराहतहै
लाज़िमउसकाममेंमुरूरनहीं
फ़िक्रमतकरहमारेजीनेका
तेरेनज़दीककुछयेदूरनहीं
फिरजिएँगेजोतुझसाहैजाँ-बख़्श
ऐसाजीनाहमेंज़रूरनहीं
आमहैयारकीतजल्ली'मीर'
ख़ासमूसाकोह-ए-तूरनहीं
  - Meer Taqi Meer
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