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Meem Maroof Ashraf
kyuuñ tire saath khwaab dekhe the
kyuuñ tire saath khwaab dekhe the | क्यूँ तिरे साथ ख़्वाब देखे थे
- Meem Maroof Ashraf
क्यूँ
तिरे
साथ
ख़्वाब
देखे
थे
हम
ने
क्यूँ
ये
अज़ाब
देखे
थे
तू
तो
कहता
था
इश्क़
है
तुम
से
तेरे
ख़त
में
जवाब
देखे
थे
सब
के
सब
तुझ
को
चाहने
वाले
हम
ने
ख़ाना
ख़राब
देखे
थे
क्या
कहा
इश्क़
में
था
क्या
पाया
रंज-ओ-ग़म
बे
हिसाब
देखे
थे
मय-कदा
छोड़
तेरी
गलियों
में
हम
ने
अहल-ए-शराब
देखे
थे
बे
वफ़ा
हम
ने
तेरे
चेहरे
पर
कैसे
कैसे
नक़ाब
देखे
थे
- Meem Maroof Ashraf
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हम
तो
उस
आँख
के
हैं
देखने
वाले,
देखो
जिस
में
शोख़ी
है
बहुत
और
हया
थोड़ी
सी
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Dagh Dehlvi
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जवाँ
होने
लगे
जब
वो
तो
हम
से
कर
लिया
पर्दा
हया
यक-लख़्त
आई
और
शबाब
आहिस्ता
आहिस्ता
Ameer Minai
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पहले
तो
मेरी
याद
से
आई
हया
उन्हें
फिर
आइने
में
चूम
लिया
अपने-आप
को
Shakeb Jalali
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मुझ
को
ये
आरज़ू
वो
उठाएँ
नक़ाब
ख़ुद
उन
को
ये
इंतिज़ार
तक़ाज़ा
करे
कोई
Asrar Ul Haq Majaz
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उन
रस
भरी
आँखों
में
हया
खेल
रही
है
दो
ज़हर
के
प्यालों
में
क़ज़ा
खेल
रही
है
Akhtar Shirani
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दीवारें
छोटी
होती
थीं
लेकिन
पर्दा
होता
था
तालों
की
ईजाद
से
पहले
सिर्फ़
भरोसा
होता
था
Azhar Faragh
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वो
अपने
चेहरे
में
सौ
आफ़ताब
रखते
हैं
इसीलिए
तो
वो
रुख़
पे
नक़ाब
रखते
हैं
Hasrat Jaipuri
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ये
गहरा
राज़
है
इसका
बदन
को
खा
ही
जाती
है
मोहब्बत
पाक
होकर
भी
हवस
तक
आ
ही
जाती
है
ALI ZUHRI
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इक
तो
ये
नूर
उस
पे
मेरी
शर्म
भी
अलग
तू
सामने
रहा
तो
निगह
उठ
न
पाएगी
shaan manral
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मोहब्बत
के
इक़रार
से
शर्म
कब
तक
कभी
सामना
हो
तो
मजबूर
कर
दूँ
Akhtar Shirani
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अव्वल
अव्वल
जो
देखती
थीं
तुम
वो
ही
दरकार
है
नज़र
हम
को
Meem Maroof Ashraf
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अभी
आग़ाज़-ए-उल्फ़त
है
चलो
इक
काम
करते
हैं
बिछड़
कर
देख
लेते
हैं
बिछड़
कर
कैसा
लगता
है
Meem Maroof Ashraf
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तिरे
होंटों
की
सुर्ख़ी
देख
कर
तो
ऐसा
लगता
है
चबाया
हो
किसी
'आशिक़
का
दिल
हिंदा
मिज़ाजी
से
Meem Maroof Ashraf
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जब
कभी
वस्ल
का
कहा
उस
से
कुछ
न
कुछ
मुश्किलें
निकल
आईं
Meem Maroof Ashraf
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अभी
तो
और
बढ़ेगी
ये
तिश्नगी
दिल
की
अभी
तो
और
भी
ज़्यादा
वो
याद
आएँगे
Meem Maroof Ashraf
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