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Meem Maroof Ashraf
khaak ko khaak men milaate hue
khaak ko khaak men milaate hue | ख़ाक को ख़ाक में मिलाते हुए
- Meem Maroof Ashraf
ख़ाक
को
ख़ाक
में
मिलाते
हुए
अच्छा
लगता
है
ज़ख़्म
खाते
हुए
ज़िक्र
होता
है
दोस्तों
में
तिरा
सिगरेटों
का
धुआँ
उड़ाते
हुए
भूल
जाता
है
बे-वफ़ाई
को
अपने
औसाफ़
वो
गिनाते
हुए
कौन
साँसें
तिरी
बढ़ाता
है
जिस्म
पर
उँगलियाँ
फिराते
हुए
तुझ
से
तो
यूँँ
ही
कह
रहा
था
बस
अच्छी
लगती
है
खिलखिलाते
हुए
यारों
जा
कर
के
उस
को
समझाओ
खो
न
दे
मुझ
को
आज़माते
हुए
हम
को
हरगिज़
न
ख़ुश
समझ
लेना
गरचे
रहते
हैं
मुस्कुराते
हुए
साम'ईं
वाह
वाह
करते
रहे
रो
पड़ा
मैं
ग़ज़ल
सुनाते
हुए
उस
का
जाना
अजीब
था
'क़ैसर'
ख़ुद
भी
रोया
मुझे
रुलाते
हुए
- Meem Maroof Ashraf
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चला
तो
हूँ
मैं
उन
के
दर
से
बिगड़
कर
हँसी
आ
रही
है
कि
आना
पड़ेगा
Khumar Barabankvi
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कभी
चल
कर
रुके
होंगे,
कभी
रुक
कर
चले
होंगे
अदा-ए-ख़ुश-ख़िरामी
में
वो
जाने
कब
ढले
होंगे
सियाही
बे-सबब
आँखों
के
साहिल
पर
नहीं
आती
यक़ीनन
चश्मे-आतिश
में
कई
'आशिक़
जले
होंगे
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Wajid Husain Sahil
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दिलों
को
तेरे
तबस्सुम
की
याद
यूँँ
आई
कि
जगमगा
उठें
जिस
तरह
मंदिरों
में
चराग़
Firaq Gorakhpuri
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ज़मीं
पे
घर
बनाया
है
मगर
जन्नत
में
रहते
हैं
हमारी
ख़ुश-नसीबी
है
कि
हम
भारत
में
रहते
हैं
Mehshar Afridi
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उम्र
के
आख़िरी
मक़ाम
में
हम
मिल
भी
जाए
तो
क्या
ख़ुशी
होगी
क्या
सितम
तुम
को
देखने
के
लिए
हम
को
दुनिया
भी
देखनी
होगी
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Vikram Sharma
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क्या
तकल्लुफ़
करें
ये
कहने
में
जो
भी
ख़ुश
है
हम
उस
से
जलते
हैं
Jaun Elia
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तेरे
सिवा
भी
कई
रंग
ख़ुश
नज़र
थे
मगर
जो
तुझको
देख
चुका
हो
वो
और
क्या
देखे
Parveen Shakir
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उसे
अभी
भी
मेरे
दिल
के
हाल
का
नहीं
पता
तो
यानी
उसको
अपने
घर
का
रास्ता
नहीं
पता
ये
तेरी
भूल
है
ऐ
मेरे
ख़ुश-ख़याल
के
मुझे
पराई
औरतों
से
तेरा
राब्ता
नहीं
पता
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Ruqayyah Maalik
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दफ्न
ताबूत
में
कर
तिरी
हर
ख़ुशी
जश्न
कैसे
मनाते
है
मय्यत
पे
भी
ख़ास
तारीख़
थी
इम्तिहाँ
की
मगर
आज
बारात
उसकी
बुला
ली
गई
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Shilpi
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तू
अगर
ख़ुश
है
मेरे
रोने
में
मैं
वहाँ
बैठ
जाऊँ
कोने
में
देखते
हो
ये
ईंट
का
तकिया
एक
अर्सा
लगा
भिगोने
में
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Zahid Bashir
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महरूम
ही
रहता
है
वो
इश्क़
की
लज़्ज़त
से
जब
तक
कि
मोहब्बत
में
रुस्वा
नहीं
होता
है
Meem Maroof Ashraf
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एक
ही
शख़्स
इब्तिदा
है
मिरी
एक
ही
शख़्स
इख़्तिताम
मिरा
Meem Maroof Ashraf
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सो
भी
शमएँ
बुझा
के
सोते
हैं
चूँकि
हम
दिल
जला
के
सोते
हैं
Meem Maroof Ashraf
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मैं
चाहता
था
बस
कि
मिरे
साथ
तू
रहे
क्या
तुझ
से
और
जान
मिरी
चाहता
था
मैं
Meem Maroof Ashraf
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तिरे
होंटों
की
सुर्ख़ी
देख
कर
तो
ऐसा
लगता
है
चबाया
हो
किसी
'आशिक़
का
दिल
हिंदा
मिज़ाजी
से
Meem Maroof Ashraf
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