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Manohar Shimpi
shakl se kyun chhui-muii lagti
shakl se kyun chhui-muii lagti | शक्ल से क्यूँँ छुई-मुई लगती
- Manohar Shimpi
शक्ल
से
क्यूँँ
छुई-मुई
लगती
अक्ल
से
क्यूँँ
छुई-मुई
लगती
- Manohar Shimpi
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तन्हा
कहाँ
सुकून
के
ही
वास्ते
चले
जो
मुस्तक़िल
लगे
उसी
ही
रास्ते
चले
Manohar Shimpi
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ख़ुदाई
बयाँँ
जब
हक़ीक़त
न
करती
तभी
बेबसी
क्या
बग़ावत
न
करती
Manohar Shimpi
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इस
मंच
पे
आना
कहाँ
आसान
था
हासिल
हुआ
इस-वक़्त
वो
अरमान
था
मिलना
यहाँ
सब
सेे
फ़क़त
सपना
न
था
मिलके
हुआ
पूरा
वही
सम्मान
था
पढ़ते
रहे
लिखते
रहे
हैं
हम
सभी
पढ़के
ग़ज़ल
लिखना
कहाँ
आसान
था
जलते
कभी
बुझते
दिए
वो
गाह
के
देखे
जिधर
से
एक
रौशनदान
था
शोहरत
कभी
ऐसे
हमें
मिलती
नहीं
दिल
से
उसे
पाना
वही
अरमान
था
राह-ए-सफ़र
में
वक़्त
क्यूँ
इतना
लगा
ये
सोच
के
मैं
भी
बहुत
हैरान
था
हाथों
लगा
मेरे
वही
अनमोल
था
कोई
सुख़न-वर
का
वही
दीवान
था
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Manohar Shimpi
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कर्ब
से
ही
कोई
रिश्ता
है
पुराना
ख़्वाब
दे
जाते
नया
फिर
इक
बहाना
Manohar Shimpi
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चमकते
शनै
कब
सितारे
हुए
हैं
अँधेरी
गली
फिर
उजारे
हुए
हैं
जहाँ
भी
चलेंगे
वहाँ
साथ
चलते
ग़म-ए-यार
ही
फिर
सहारे
हुए
हैं
रहे
अजनबी
से
कभी
पास
रहके
कई
पल
अकेले
गुज़ारे
हुए
हैं
बुलाए
अगर
वो
बयारे
समुंदर
तुम्हारे
लिए
ही
किनारे
हुए
हैं
दिखे
जब
हसीं
सी
तुम्हारी
अदाएँ
तराशे
हुए
से
नज़ारे
हुए
हैं
अधूरे
'मनोहर'
नहीं
हम
कभी
थे
मुकम्मल
हुए
फिर
सितारे
हुए
हैं
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Manohar Shimpi
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