हवासेनबुझतीसुलगतीरहीहूँ
किसीज़लज़लेकीवोअंगारहूँमैं
खुलेआसमाँमेंखड़ीहूँसदीसे
पुरानेज़मानेकीदीवारहूँमैं
कईबारजीती,हमींनेलड़ाई
अदूसेलड़ेहैवोतलवारहूँमैं
किसीकेलिएहूँ,सबबसिर्फ़कोई
कभीबेकसूरों,कीतकरारहूँमैं
छपेहैकभीसचग़लतझूठजिस
में
लगेजोसहीहै,वोअख़बारहूँमैं
मोहब्बतकरेजोखुले-'आमदिलसे
उसेलोगकहतेवहींप्यारहूँमैं
ग़लतफ़ैसलेजबकभीहोकचहरी
तभीमैं'मनोहर'गुनहगारहूँमैं