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Majrooh Sultanpuri
rok saka ha
rok saka ha | रोक सकता हमें ज़िंदान-ए-बला क्या 'मजरूह'
- Majrooh Sultanpuri
रोक
सकता
हमें
ज़िंदान-ए-बला
क्या
'मजरूह'
हम
तो
आवाज़
हैं
दीवार
से
छन
जाते
हैं
- Majrooh Sultanpuri
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अपना
हर
तिनका
समेटे
किस
जगह
पर
जा
छुपे
हम
तिरी
आवाज़
की
चिड़ियों
से
घबराते
हुए
Swapnil Tiwari
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ख़ामोशी
में
आवाज़
का
किरदार
कोई
है
जो
बोलता
रहता
है
लगातार,
कोई
है
Shakeel Gwaliari
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लहजा
कि
जैसे
सुब्ह
की
ख़ुश्बू
अज़ान
दे
जी
चाहता
है
मैं
तिरी
आवाज़
चूम
लूँ
Bashir Badr
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इस
शहर
में
जीने
के
अंदाज़
निराले
हैं
होंटों
पे
लतीफ़े
हैं
आवाज़
में
छाले
हैं
Javed Akhtar
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तेरी
आवाज़
मेरा
रिज़्क
हुआ
करती
थी
तू
मुझे
भूख
से
मारेगा
ये
सोचा
नहीं
था
Rafi Raza
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वैसे
तो
उसका
नाम
नहीं
हाफ़िज़े
में
अब
मुमकिन
है
रूबरू
जो
कभी
हो,
पुकार
दूँ
Bhaskar Shukla
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पहले
कहता
है
जुनूँ
उसका
गिरेबान
पकड़
फिर
मेरा
दिल
मुझे
कहता
है
इधर
कान
पकड़
ऐसी
वहशत
भी
न
हो
घर
के
दरो
बाम
कहें
कोई
आवाज़
ही
ले
आ
कोई
मेहमान
पकड़
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Azbar Safeer
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आवाज़
दे
के
देख
लो
शायद
वो
मिल
ही
जाए
वर्ना
ये
उम्र
भर
का
सफ़र
राएगाँ
तो
है
Muneer Niyazi
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बहुत
बर्बाद
हैं
लेकिन
सदा-ए-इंक़लाब
आए
वहीं
से
वो
पुकार
उठेगा
जो
ज़र्रा
जहाँ
होगा
Ali Sardar Jafri
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गर
कोई
मुझ
सेे
आकर
कहता,
यार
उदासी
है
मैं
उसको
गले
लगाकर
कहता,
यार
उदासी
है
होता
दरवेश
अगर
मैं
तो
फिर
सारी
दो-पहरी
गलियों
में
सदा
लगाकर
कहता,
यार
उदासी
है
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Siddharth Saaz
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तुझे
न
माने
कोई
तुझ
को
इस
से
क्या
मजरूह
चल
अपनी
राह
भटकने
दे
नुक्ता-चीनों
को
Majrooh Sultanpuri
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देख
ज़िंदाँ
से
परे
रंग-ए-चमन
जोश-ए-बहार
रक़्स
करना
है
तो
फिर
पाँव
की
ज़ंजीर
न
देख
Majrooh Sultanpuri
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सुनते
हैं
कि
काँटे
से
गुल
तक
हैं
राह
में
लाखों
वीराने
कहता
है
मगर
ये
अज़्म-ए-जुनूँ
सहरा
से
गुलिस्ताँ
दूर
नहीं
Majrooh Sultanpuri
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अलग
बैठे
थे
फिर
भी
आँख
साक़ी
की
पड़ी
हम
पर
अगर
है
तिश्नगी
कामिल
तो
पैमाने
भी
आएँगे
Majrooh Sultanpuri
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तिरे
सिवा
भी
कहीं
थी
पनाह
भूल
गए
निकल
के
हम
तिरी
महफ़िल
से
राह
भूल
गए
Majrooh Sultanpuri
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