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Madan pal
jawaan hai raat saaqiya sharaab la sharaab la
jawaan hai raat saaqiya sharaab la sharaab la | जवाँ है रात साक़िया शराब ला शराब ला
- Madan pal
जवाँ
है
रात
साक़िया
शराब
ला
शराब
ला
ज़रा
सी
प्यास
तो
बुझा
शराब
ला
शराब
ला
तिरे
शबाब
पर
सदा
करम
रहे
बहार
का
तुझे
लगे
मिरी
दु'आ
शराब
ला
शराब
ला
यहाँ
कोई
न
जी
सका
न
जी
सकेगा
होश
में
मिटा
दे
नाम
होश
का
शराब
ला
शराब
ला
तिरा
बड़ा
ही
शुक्रिया
पिलाए
जा
पिलाए
जा
न
ज़िक्र
कर
हिसाब
का
शराब
ला
शराब
ला
- Madan pal
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प्रेम
की
गली
में
सब
शराब
लेकर
आए
थे
हम
बहुत
ख़राब
थे
किताब
लेकर
आए
थे
Aman Akshar
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कहाँ
मय-ख़ाने
का
दरवाज़ा
'ग़ालिब'
और
कहाँ
वाइज़
पर
इतना
जानते
हैं
कल
वो
जाता
था
कि
हम
निकले
Mirza Ghalib
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मेरी
जवानी
को
कमज़ोर
क्यूँ
समझते
हो
तुम्हारे
वास्ते
अब
भी
शबाब
बाक़ी
है
ये
और
बात
है
बोतल
ये
गिर
के
टूट
गई
मगर
अभी
भी
ज़रा
सी
शराब
बाक़ी
है
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Paplu Lucknawi
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बे-सबब
मरने
से
अच्छा
है
कि
हो
कोई
सबब
दोस्तों
सिगरेट
पियो
मय-ख़्वारियाँ
करते
रहो
Ameer Imam
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वो
गर
शराब
है
तो
समझो
कि
मैं
नशा
हूँ
कुछ
इस
तरह
से
भीतर
उस
शख़्स
के
बसा
हूँ
Harsh saxena
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ऐ
शैख़
तू
शराब
के
पीछे
न
पड़
कभी
ये
ख़ुद
को
वाहियात
बनाने
की
चीज़
है
Shivsagar Sahar
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दिन
रात
मय-कदे
में
गुज़रती
थी
ज़िंदगी
'अख़्तर'
वो
बे-ख़ुदी
के
ज़माने
किधर
गए
Akhtar Shirani
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मेरे
आँसू
नहीं
थम
रहे
कि
वो
मुझ
सेे
जुदा
हो
गया
और
तुम
कह
रहे
हो
कि
छोड़ो
अब
ऐसा
भी
क्या
हो
गया
मय-कदों
में
मेरी
लाइनें
पढ़ते
फिरते
हैं
लोग
मैंने
जो
कुछ
भी
पी
कर
कहा
फ़लसफ़ा
हो
गया
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Tehzeeb Hafi
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क़र्ज़
की
पीते
थे
मय
लेकिन
समझते
थे
कि
हाँ
रंग
लावेगी
हमारी
फ़ाक़ा-मस्ती
एक
दिन
Mirza Ghalib
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फ़रेब-ए-साक़ी-ए-महफ़िल
न
पूछिए
'मजरूह'
शराब
एक
है
बदले
हुए
हैं
पैमाने
Majrooh Sultanpuri
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आज
कल
आप
साथ
चलते
नहीं
इस
लिए
लोग
हम
से
जलते
नहीं
कैसे
ग़ज़लों
की
रुत
जवाँ
होगी
जब
निगाहों
के
तीर
चलते
नहीं
तुम
को
दुनिया
कहेगी
दीवाना
रुत
बदलती
है
तुम
बदलते
नहीं
शहरों
शहरों
हमारा
चेहरा
है
और
हम
घर
से
भी
निकलते
नहीं
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Madan pal
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दिन
आ
गए
शबाब
के
आँचल
सँभालिए
होने
लगी
है
शहर
में
हलचल
सँभालिए
चलिए
सँभल
सँभल
के
कठिन
राह-ए-इश्क़
है
नाज़ुक
बड़ी
है
आप
की
पायल
सँभालिए
सज-धज
के
आप
निकले
सर-ए-राह
ख़ैर
हो
टकरा
न
जाए
आप
का
पागल
सँभालिए
घर
से
न
जाओ
दूर
किसी
अजनबी
के
साथ
बरसेंगे
ज़ोर
ज़ोर
से
बादल
सँभालिए
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Madan pal
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