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Daagh Aligarhi
ik shahenshaah. ne banwa ke hañsi taajmahal
ik shahenshaah. ne banwa ke hañsi taajmahal | इक शहनशाह ने बनवा के हँसी ताजमहल
- Daagh Aligarhi
इक
शहनशाह
ने
बनवा
के
हँसी
ताजमहल
हाथ
कटवाए
ग़रीबों
के,
हुनर
छीन
लिया
- Daagh Aligarhi
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पुरानी
कश्ती
को
पार
लेकर
फ़क़त
हमारा
हुनर
गया
है
नए
खेवइये
कहीं
न
समझें
नदी
का
पानी
उतर
गया
है
Uday Pratap Singh
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ख़ुद
को
मनवाने
का
मुझको
भी
हुनर
आता
है
मैं
वो
कतरा
हूँ
समुंदर
मेरे
घर
आता
है
Waseem Barelvi
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अब
दुआएँ
पा
रहा
है
हर
दिल-ए-नाशाद
की
क्या
ग़ज़ब
होगा
वो
जिसने
ख़ुद-कुशी
ईजाद
की
शा'इरी
का
ये
हुनर
कुछ
देर
से
आया
मगर
जी-हुज़ूरी
की
नहीं
मैंने
किसी
उस्ताद
की
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Rituraj kumar
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गिफ़्ट
कर
देता
हूँ
उसको
मैं
किताबें,
लेकिन
उनको
पढ़
लेने
की
मोहलत
नहीं
देता
उसको
Harman Dinesh
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किताबें
बंद
करके
जब
मैं
बिस्तर
पर
पहुँचता
हूँ
तुम्हारी
याद
भी
आकर
बगल
में
लेट
जाती
है
Bhaskar Shukla
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सिर्फ़
तालीम
है
वो
शय
यारों
जिस
सेे
ज़िंदा
चराग़
जलते
हैं
Ajeetendra Aazi Tamaam
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भूलभुलैया
था
उन
ज़ुल्फ़ों
में
लेकिन
हमको
उस
में
अपनी
राहें
दिखती
थीं
आपकी
आँखों
को
देखा
तो
इल्म
हुआ
क्यूँँ
अर्जुन
को
केवल
आँखें
दिखती
थीं
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Ashraf Jahangeer
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हम
भी
दरिया
हैं
हमें
अपना
हुनर
मालूम
है
जिस
तरफ़
भी
चल
पड़ेंगे
रास्ता
हो
जाएगा
Bashir Badr
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बा-हुनर
होके
कुछ
न
कर
पाना
रेज़ा-रेज़ा
बिखर
के
ढेह
जाना
मुझको
बेहद
उदास
करता
है
ख़ास
लोगों
का
आम
रह
जाना
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Vishal Bagh
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हमें
पढ़ाओ
न
रिश्तों
की
कोई
और
किताब
पढ़ी
है
बाप
के
चेहरे
की
झुर्रियाँ
हम
ने
Meraj Faizabadi
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मिटते
मिटते
मिटती
है
हो
अगर
कसक
कोई
ज़ख़्म
चाहे
जैसा
हो,
भरते
भरते
भरता
है
Daagh Aligarhi
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आप
हैं
दोस्त
तो
फिर
आपसे
दुश्मन
बेहतर
राम
को
याद
तो
कर
लेता
था
रावण
अक्सर
आप
मज़बूर
थे
बिकने
को
बिके
मंदे
में
हमनें
बाजार
की
शर्तों
को
लगा
दी
ठोकर
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Daagh Aligarhi
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मुसलसल
साथ
पटरी
चल
रही
है
तभी
तो
रेलगाड़ी
चल
रही
है
हमारा
है
अभी
ईमाँ
सलामत
अभी
चटनी
से
रोटी
चल
रही
है
अभी
सस्ते
बिकेंगे
ग़म
हमारे
अभी
सोने
पे
मंदी
चल
रही
है
मोहब्बत
का
पड़ा
है
बंद
दफ़्तर
मेरी
अरसे
से
छुट्टी
चल
रही
है
नहीं
हारा
हूँ
मैं
बाज़ी
अभी
तक
मियाँ!
मेरी
भी
गोटी
चल
रही
है
यहाँ
है
आपकी
तलवार
नाकाम
यहाँ
मेरी
ही
सूई
चल
रही
है
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Daagh Aligarhi
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ले
हम
भी
सर
उठाते
हैं
मुहब्बत
दिखा
जो
दाँव
आते
हैं
मुहब्बत
अलिफ़
से
मीम
तक
लाये
थे
जिनको
वो
हम
को
ही
सिखाते
हैं
मुहब्बत
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Daagh Aligarhi
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बस्ती
बस्ती
ख़ाक
उड़ाये,
बस
वहशत
का
मारा
हो
उस
सेे
इश्क़
की
आस
न
करना
जिसका
मन
बंजारा
हो
ख़ुद
को
शाइर
कहते
रहना
दिल
को
लाख
सुकूँ
दे
दे
लेकिन
दुनिया
की
नज़रों
में
तुम
अब
भी
आवारा
हो
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Daagh Aligarhi
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