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Krishnakant Kabk
tumhaare saath mujhko chaai peena hai magar
tumhaare saath mujhko chaai peena hai magar | तुम्हारे साथ मुझको चाय पीना है मगर
- Krishnakant Kabk
तुम्हारे
साथ
मुझको
चाय
पीना
है
मगर
ये
भी
है
शर्त
कप
सिर्फ़
एक
होना
चाहिए
- Krishnakant Kabk
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इतनी
दिलकश
थी
गुफ़्तगू
उसकी
चाय
का
कप
भी
सुन
रहा
था
उसे
Hashim Raza Jalalpuri
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हमेशा
ठंडी
हो
जाती
थी
चाय
बातों
बातों
में
वो
बातें
जो
इन
आँखों
से
किया
करते
थे
हम
दोनों
Hasan Abbasi
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हम
इक
ही
लौ
में
जलाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
नई
हवा
से
बचाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
दरअस्ल
उसको
फ़क़त
चाय
ख़त्म
करनी
थी
हम
उसके
कप
को
सुनाते
रहे
ग़ज़ल
अपनी
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Zubair Ali Tabish
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आज
फिर
चाय
बनाते
हुए
वो
याद
आया
आज
फिर
चाय
में
पत्ती
नहीं
डाली
मैं
ने
Taruna Mishra
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आज
उसके
गाल
चू
में
हैं
तो
अंदाज़ा
हुआ
चाय
अच्छी
है
मगर
थोड़ा
सा
मीठा
तेज़
है
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Tehzeeb Hafi
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सिगरटें
चाय
धुआँ
रात
गए
तक
बहसें
और
कोई
फूल
सा
आँचल
कहीं
नम
होता
है
Wali Aasi
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नाज़-ओ-नख़रे
क्या
उठाए,
क्या
सुने
उस
के
गिले
देखते
ही
देखते
लड़की
घमंडी
हो
गई
देखते
रहने
में
उस
को
और
क्या
होता,
मगर
जो
थी
जान-ए-आरज़ू,
वो
चाय
ठंडी
हो
गई
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Kazim Rizvi
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सोचता
हूँ
वक़्त
की
तस्वीर
जब
मुझ
सेे
बनेगी
तो
भला
उसकी
कलाई
पर
घड़ी
कैसी
लगेगी
चाय
उस
से
पूछ
तो
सकता
हूँ
मैं
भी
दोस्त,लेकिन
सोचता
हूँ
कौन
सा
वो
कहने
भर
से
चल
पड़ेगी
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Abhishar Geeta Shukla
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हर
सुब्ह
उठ
के
इसको
मैं
हूँ
चूमता
चाय
है
जैसे
ये
कोई
सौतन
तेरी
RAJAT AWASTHI
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अब
ये
क्या
बात
हुई
गाल
को
चूमूँ
लब
नइँ
यानी
हम
चाय
पिए
वो
भी
बिना
चीनी
के
Neeraj Neer
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भूलने
भुलाने
के
किस्से
क्या
बताएँ
हम
मतला
भूल
जाते
हैं
शे'र
याद
रहते
हैं
Krishnakant Kabk
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न
रूई
हो
तो
अपने
अश्कों
से
बाती
बनाएँगे
बुझा
दीया
हमारा
तो
हवा
से
लड़
भी
जाएँगे
बनाई
रोज़
चौदह
साल
रंगोली
बस
इस
ख़ातिर
न
जाने
रामजी
वनवास
से
कब
लौट
आएंँगे
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Krishnakant Kabk
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हाथ
तूने
जब
लगाए
रंग
में
छा
गया
है
शह'र
तेरे
रंग
में
जाँ
लुटाते
लोग
तेरे
रंग
पर
क्या
रखा
है
इस
लुटेरे
रंग
में
और
सोने
पे
सुहागा
कुछ
नहीं
बस
तुझे
देखूँ
सुनहरे
रंग
में
तू
मुझे
जब
से
मिली
ऐसा
लगा
मिल
गया
इक
रंग
मेरे
रंग
में
ज़िंदगी
बेरंग
थी
पहले
मेरी
मैं
भी
रंगा
धीरे
धीरे
रंग
में
याद
करके
ही
तुझे
मैं
सो
गया
ख़ुद
को
पाया
फिर
सवेरे
रंग
में
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Krishnakant Kabk
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हाँ
ये
बहुत
पाबन्दियों
में
बाँध
कर
रखती
हमें
फिर
भी
ग़ज़ल
के
जितनी
अच्छी
कोई
महबूबा
नहीं
Krishnakant Kabk
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रंग
जब
बनकर
गवाह
आया
तेरी
तासीर
का
मैंने
ये
आलम
भी
देखा
है
तेरी
तस्वीर
का
Krishnakant Kabk
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