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Krish Gour 'Jazbaat'
kuchh pal ko ye ho saktaa hai main dar jaaun ya tham jaaun
kuchh pal ko ye ho saktaa hai main dar jaaun ya tham jaaun | कुछ पल को ये हो सकता है मैं डर जाऊँ या थम जाऊँ
- Krish Gour 'Jazbaat'
कुछ
पल
को
ये
हो
सकता
है
मैं
डर
जाऊँ
या
थम
जाऊँ
पर
चाँद
अकेला
चमकेगा
कितने
भी
तारे
ले
जाओ
- Krish Gour 'Jazbaat'
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वो
तो
दुनिया
जीतेगा
ही
जो
रक्खेगा
सपने
पहले
Krish Gour 'Jazbaat'
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ज़माने
ने
हमको
दिया
भी
तो
क्या
है
ज़रा
सी
मुहब्बत
और
इतनी
दग़ा
है
यही
ज़ख़्म
उसकी
अमानत
बची
है
यही
ज़ख़्म
सीने
पे
काई
भरा
है
छुपा
क्या
है
नज़रों
में
मेरी
बताऊँ
वफ़ा
है
वफ़ा
है
वफ़ा
है
वफ़ा
है
किताबों
ने
पूछा
था
मुझको
किसी
दिन
तेरा
फ़ोन
का
ऐसा
क्या
माजरा
है
तुम्हारे
हुनर
की
लकीरें
कहाँ
हैं
मेरी
मेहनतों
का
दिया
जल
उठा
है
हराए
सताए
हुओं
की
ये
दुनिया
ये
दुनिया
नहीं
है
ये
सर्कस
लगा
है
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रूठी
हुई
ख़ुशी
से
गिले
कर
रहे
हैं
हम
यानी
कि
मतलबी
से
गिले
कर
रहे
हैं
हम
क्यूँ
आप
मेरे
दिल
को
मसल
कर
चले
गए
तस्वीर
आपकी
से
गिले
कर
रहे
हैं
हम
ये
किस
की
चाॅंदनी
मेरे
हिस्से
में
आ
गई
ये
किस
की
आशिक़ी
से
गिले
कर
रहे
हैं
हम
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चलो
परिंदों
अब
आँख
खोलो
तुम्हारी
ख़ातिर
खुला
समा
है
इसी
उजाले
की
ख़्वाहिशों
में
तुम्हीं
ने
आहें
भरी
हुई
हैं
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ये
क्या
हुआ
है
बाप
की
पगड़ी
चली
गई
सूनी
कलाई
रह
गई
राखी
चली
गई
इक
बाप
रो
रहा
था
यूँँ
शादी
की
बात
पे
पैसे
जुटा
रहा
था
कि
बेटी
चली
गई
यूँँ
मार
करके
कोख
में
नन्ही
सी
जान
को
कहने
लगे
कि
कोख
में
गरमी
चली
गई
ख़ुद
को
समझ
रहे
हो
ज़माने
में
आसमाँ
आकाश
क्या
करेगा
जो
धरती
चली
गई
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