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Kinshu Sinha
phir dhoke khaaunga dartaa hooñ
phir dhoke khaaunga dartaa hooñ | फिर धोखे खाऊँगा, डरता हूँ
- Kinshu Sinha
फिर
धोखे
खाऊँगा,
डरता
हूँ
फिर
से
मर
जाऊँगा,
डरता
हूँ
सुब्ह
लिए
जाऊँगा
अपनी
मैं
रात
लिए
आऊँगा,
डरता
हूँ
प्यार
मिलेगा
गर
दरवाज़े
पर
अंदर
शक
लाऊँगा,
डरता
हूँ
एक
खुली
खिड़की
होगी
जिस
में
झाँक
नहीं
पाऊँगा,
डरता
हूँ
रंगे
हाथों
पकड़ा
उसको
तो
मुजरिम
कहलाऊँगा,
डरता
हूँ
वो
समझाएगा
मुझको
और
मैं
जल्द
समझ
जाऊँगा,
डरता
हूँ
ख़त्म
न
कर,
मेरे
डर
को
ऐ
दोस्त
सब
सेे
टकराऊँगा,
डरता
हूँ
- Kinshu Sinha
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वो
आफ़ताब
लाने
का
देकर
हमें
फ़रेब
हम
सेे
हमारी
रात
के
जुगनू
भी
ले
गया
Rajesh Reddy
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कब
ठहरेगा
दर्द
ऐ
दिल
कब
रात
बसर
होगी
सुनते
थे
वो
आएँगे
सुनते
थे
सहर
होगी
Faiz Ahmad Faiz
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दिन
ढल
गया
और
रात
गुज़रने
की
आस
में
सूरज
नदी
में
डूब
गया,
हम
गिलास
में
Rahat Indori
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नज़रें
हो
गड़ीं
जिनकी
वसीयत
पे
दिनो-रात
माँ-बाप
कि
'उम्रों
कि
दु'आ
खाक़
करेंगे
Asad Akbarabadi
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उसे
यूँँ
चेहरा-चेहरा
ढूँढता
हूँ
वो
जैसे
रात-दिन
सड़कों
पे
होगा
Shariq Kaifi
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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कल
रात
मैं
बहुत
ही
अलग
सा
लगा
मुझे
उसकी
नज़र
ने
यूँँ
मेरी
सूरत
खंगाली
दोस्त
Afzal Ali Afzal
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सारी
रात
लगाकर
उसपर
नज़्म
लिखी
और
उसने
बस
अच्छा
लिखकर
भेजा
है
Zahid Bashir
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ये
ज़ुल्फ़
अगर
खुल
के
बिखर
जाए
तो
अच्छा
इस
रात
की
तक़दीर
सँवर
जाए
तो
अच्छा
जिस
तरह
से
थोड़ी
सी
तेरे
साथ
कटी
है
बाक़ी
भी
उसी
तरह
गुज़र
जाए
तो
अच्छा
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Sahir Ludhianvi
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मेहरबाँ
हम
पे
हर
इक
रात
हुआ
करती
थी
आँख
लगते
ही
मुलाक़ात
हुआ
करती
थी
हिज्र
की
रात
है
और
आँख
में
आँसू
भी
नहीं
ऐसे
मौसम
में
तो
बरसात
हुआ
करती
थी
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Ismail Raaz
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वो
मुहब्बत
न
कर
सका
हम
सेे
कुछ
ज़ियादा
ही
क़ीमती
थे
हम
Kinshu Sinha
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झूठ
क्यूँ
सच
जैसा
लगता
है
मुझे
अब
मैं
तुझे
पहली
मुहब्बत
मानता
हूँ
Kinshu Sinha
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चलते
हो
मेरी
राह
क्या
होना
ही
है
तबाह
क्या
हमको
जो
देखे
तक
नहीं
करनी
उधर
निगाह
क्या
तय
कर
लिया
तो
कर
लिया
लेनी
कोई
सलाह
क्या
पीते
तो
सब
हैं
दर्द
में
हमने
किया
गुनाह
क्या
हम
‛आह’
सुनने
वालों
को
मिल
जाती
है
पनाह
क्या
समझे
नहीं
जो
शे'र
तो
करते
हो
वाह
वाह
क्या
दुनिया
से
लड़ने
कहती
हो
कर
लोगी
तुम
निक़ाह
क्या
अब
जो
किया,
सही
किया
इल्ज़ाम
क्या,
गवाह
क्या
महताब
है
चमक
रहा
अब
होगी
और
सबाह
क्या
ये
देखो
ज़िन्दगी
मेरी
कुछ
इस
सेे
है
सियाह
क्या
होना
है
बस
ज़लील
‛किंशु’
होगी
कुछ
और
चाह
क्या
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Kinshu Sinha
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कितने
भी
मजबूत
हों
पर
टूटते
हैं
टूटते
हैं
लोग
जब
घर
टूटते
हैं
Kinshu Sinha
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है
ख़िज़ाँ
या
बहार
वो
लड़की
या
है
इन
सबके
पार
वो
लड़की
शब
चमकती
है
उसकी
बातों
से
बिजली
की
एक
तार
वो
लड़की
उसको
भी
इंकलाब
लाना
है
है
बहुत
शानदार
वो
लड़की
ऐसा
लगता
है
कबसे
मेरा
ही
करती
है
इंतज़ार
वो
लड़की
मैं
नहीं
कहता
क़ीमती
हूँ
मैं
कहती
है
बार
बार
वो
लड़की
सिर्फ़
मैं
ही
नहीं
फ़िदा
उसपे
हर
जहाँ
की
पुकार
वो
लड़की
वो
मुझे
होशियार
कहती
है
है
बहुत
होशियार
वो
लड़की
इक
तो
दिल्ली
है
दूर
काफ़ी
और
मिलने
को
बेक़रार
वो
लड़की
एक
पल
बर्फ़
सी
है,
अगले
पल
एक
सौ
दो
बुखार
वो
लड़की
जाम
पीना
है
उसको
मेरे
संग
करती
है
ऐतबार
वो
लड़की
रब्त
बेनाम
ठीक
तो
है
पर
सच
कहूँ
तो
है
प्यार
वो
लड़की
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Kinshu Sinha
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