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Khurram Afaq
ab aise zaaviye par lau rakhi jaane lagii hai
ab aise zaaviye par lau rakhi jaane lagii hai | अब ऐसे ज़ाविए पर लौ रखी जाने लगी है
- Khurram Afaq
अब
ऐसे
ज़ाविए
पर
लौ
रखी
जाने
लगी
है
चराग़ों
के
तले
भी
रोशनी
जाने
लगी
है
असासो
के
नए
हक़दार
पैदा
हो
रहे
हैं
वसीयत
इसलिए
जल्दी
लिखी
जाने
लगी
है
नया
पहलू
सलीक़े
से
बयाँ
करना
पड़ेगा
कहानी
अब
तवज्जोह
से
सुनी
जाने
लगी
है
सवाली
इसलिए
चुप
चाप
रुख़्सत
हो
रहे
हैं
तेरी
सूरत
बा-आसानी
पढ़ी
जाने
लगी
है
- Khurram Afaq
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मेरी
नींदें
उड़ा
रक्खी
है
तुम
ने
ये
कैसे
ख़्वाब
दिखलाती
हो
जानाँ
किसी
दिन
देखना
मर
जाऊँगा
मैं
मेरी
क़स
में
बहुत
खाती
हो
जानाँ
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Subhan Asad
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कहते
भी
हैं
कि
हम
सेे
मुहब्बत
नहीं
उन्हें
और
अब
तलक
रखी
है
निशानी
सँभाल
कर
Divy Kamaldhwaj
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कैसी
बिपता
पाल
रखी
है
क़ुर्बत
की
और
दूरी
की
ख़ुशबू
मार
रही
है
मुझ
को
अपनी
ही
कस्तूरी
की
Naeem Sarmad
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याद
तो
होंगी
वो
बातें
तुझे
अब
भी
लेकिन
शेल्फ़
में
रक्खी
हुई
बंद
किताबों
की
तरह
Parveen Shakir
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तुम
ने
उस
रोज़
क़यामत
ही
उठा
रक्खी
थी
तुम
ने
उस
रोज़
मुझे
देखते
देखा
होता
Tarkash Pradeep
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और
आसान
नहीं
हो
सकता
फ़रियादों
को
पूरा
करना
एक
ही
आस
लगा
रक्खी
है,
ख़ुदा
सभी
बन्दों
ने
तुझ
सेे
Siddharth Saaz
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बात
ऐसी
भी
भला
आप
में
क्या
रक्खी
है
इक
दिवाने
ने
ज़मीं
सर
पे
उठा
रक्खी
है
इत्तिफ़ाक़न
कहीं
मिल
जाए
तो
कहना
उस
सेे
तेरे
शाइर
ने
बड़ी
धूम
मचा
रक्खी
है
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Ismail Raaz
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रखी
थी
ले
के
कॉपी
हम
ने
उसकी
ख़ुशी
से
झूम
उठा
बस्ता
हमारा
Ankit Maurya
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बना
रक्खी
हैं
दीवारों
पे
तस्वीरें
परिंदों
की
वगर्ना
हम
तो
अपने
घर
की
वीरानी
से
मर
जाएँ
Afzal Khan
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जो
यहाँ
ख़ुद
ही
लगा
रक्खी
है
चारों
जानिब
एक
दिन
हम
ने
इसी
आग
में
जल
जाना
है
Zafar Iqbal
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अब
ऐसे
ज़ाविए
पर
लौ
रखी
जाने
लगी
है
चराग़ों
के
तले
भी
रोशनी
जाने
लगी
है
नया
पहलू
सलीक़े
से
बयाँ
करना
पड़ेगा
कहानी
अब
तवज्जोह
से
सुनी
जाने
लगी
है
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Khurram Afaq
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ख़ुद
बुलाओ
के
वो
यूँँ
घर
से
नहीं
निकलेगा
यहाँ
इनाम
मुक़द्दर
से
नहीं
निकलेगा
ऐसे
मौसम
में
बिना
काम
के
आया
हुआ
शख़्स
इतनी
जल्दी
तेरे
दफ़्तर
से
नहीं
निकलेगा
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Khurram Afaq
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थोड़ा
सा
इसरार
करें
तो
इतनी
मोहब्बत
मिल
जाती
है
अब
भी
उसको
देखने
और
छूने
की
इजाज़त
मिल
जाती
है
दस
सालों
से
पड़े
हुए
हैं
हम
बेहाल
तेरे
दिल
में
इतने
में
तो
ग़ैर-मुमालिक
की
शहरियत
मिल
जाती
है
इश्क़
अगर
हम
सेाए
में
हो
जाए
तो
ये
फ़ाइदा
है
दिल
से
दिल
मिल
जाता
है
और
छत
से
छत
मिल
जाती
है
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Khurram Afaq
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बात
करते
हुए
बे-ख़याली
में
ज़ुल्फ़ें
खुली
छोड़
दी
हम
निहत्थों
पे
उसने
ये
कैसी
बलाएँ
खुली
छोड़
दी
साथ
जब
तक
रहे
एक
लम्हे
को
भी
रब्त
टूटा
नहीं
उसने
आँखें
अगर
बंद
कर
ली
तो
बाँहें
खुले
छोड़
दी
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Khurram Afaq
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हर
कोई
अपने
घर
पलट
गया
है
मसअला
ख़ैर
से
निमट
गया
है
कान
मानूस
होते
जाएँगे
और
लगेगा
कि
शोर
घट
गया
है
वो
भी
ख़ामोश
हो
गया
मैं
भी
यूँँ
लगा
जैसे
फ़ोन
कट
गया
है
इक
क़दम
मैं
ने
आगे
क्या
रखा
दो
क़दम
कोई
पीछे
हट
गया
है
हाथ
आँखों
पे
रख
के
चलते
हैं
रास्ता
अब
तो
इतना
रट
गया
है
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Khurram Afaq
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