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Khalil Ur Rehman Qamar
yaad hai pahle roz kaha tha
yaad hai pahle roz kaha tha | "याद है पहले रोज़ कहा था"
- Khalil Ur Rehman Qamar
"याद
है
पहले
रोज़
कहा
था"
याद
है
पहले
रोज़
कहा
था
फिर
न
कहना
ग़लती
दिल
की
प्यार
समझ
के
करना
लड़की
प्यार
निभाना
होता
है
फिर
पार
लगाना
होता
है
याद
है
पहले
रोज़
कहा
था
साथ
चलो
तो
पूरे
सफ़र
तक
मर
जाने
की
अगली
ख़बर
तक
समझो
यार
ख़ुदा
तक
होगा
सारा
प्यार
वफ़ा
तक
होगा
फिर
ये
बंधन
तोड़
न
जाना
छोड़
गए
तो
फिर
न
आना
छोड़
दिया
जो
तेरा
नहीं
है
चला
गया
जो
मेरा
नहीं
है
याद
है
पहले
रोज़
कहा
था
या
तो
टूट
के
प्यार
न
करना
या
फिर
पीठ
पे
वार
न
करना
जब
नादानी
हो
जाती
है
नई
कहानी
हो
जाती
है
नई
कहानी
लिख
लाऊँगा
अगले
रोज़
मैं
बिक
जाऊँगा
तेरे
गुल
जब
खिल
जाएँगे
मुझको
पैसे
मिल
जाएँगे
याद
है
पहले
रोज़
कहा
था
बिछड़
गए
तो
मौज
उड़ाना
वापस
मेरे
पास
न
आना
जब
कोई
जाकर
वापस
आए
रोए
तड़पे
या
पछताए
मैं
फिर
उसको
मिलता
नहीं
हूँ
साथ
दोबारा
चलता
नहीं
हूँ
गुम
जाता
हूँ
खो
जाता
हूँ
मैं
पत्थर
का
हो
जाता
हूँ
- Khalil Ur Rehman Qamar
हिज्र
में
तुमने
केवल
बाल
बिगाड़े
हैं
हमने
जाने
कितने
साल
बिगाड़े
हैं
Anand Raj Singh
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जाड़ों
की
रातें
उस
पर
भी
तुम
सेे
ये
जुदाई
बाहों
की
छोड़ो
हमको
हासिल
नहीं
रजाई
Harsh saxena
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'मुनीर'
अच्छा
नहीं
लगता
ये
तेरा
किसी
के
हिज्र
में
बीमार
होना
Muneer Niyazi
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हम
कहाँ
और
तुम
कहाँ
जानाँ
हैं
कई
हिज्र
दरमियाँ
जानाँ
Jaun Elia
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कोई
समुंदर,
कोई
नदी
होती
कोई
दरिया
होता
हम
जितने
प्यासे
थे
हमारा
एक
गिलास
से
क्या
होता
ताने
देने
से
और
हम
पे
शक
करने
से
बेहतर
था
गले
लगा
के
तुमने
हिजरत
का
दुख
बाट
लिया
होता
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Tehzeeb Hafi
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ये
जो
हिजरत
के
मारे
हुए
हैं
यहाँ
अगले
मिसरे
पे
रो
के
कहेंगे
कि
हाँ
Ali Zaryoun
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मर्म
हँसने
का
समझ
पाए
ज़रा
हम
देर
से
वस्ल
जिसको
कह
रहे
थे
हिज्र
की
बुनियाद
थी
Atul K Rai
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भरम
रखा
है
तेरे
हिज्र
का
वरना
क्या
होता
है
मैं
रोने
पे
आ
जाऊँ
तो
झरना
क्या
होता
है
मेरा
छोड़ो
मैं
नइँ
थकता
मेरा
काम
यही
है
लेकिन
तुमने
इतने
प्यार
का
करना
क्या
होता
है
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Tehzeeb Hafi
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उस
मेहरबाँ
नज़र
की
इनायत
का
शुक्रिया
तोहफ़ा
दिया
है
ईद
पे
हम
को
जुदाई
का
Unknown
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बिछड़
के
तुझ
सेे
न
देखा
गया
किसी
का
मिलाप
उड़ा
दिए
हैं
परिंदे
शजर
पे
बैठे
हुए
Adeem Hashmi
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तेरे
दिल
के
निकाले
हम
कहाँ
भटके
कहाँ
पहुँचे
मगर
भटके
तो
याद
आया
भटकना
भी
ज़रूरी
था
Khalil Ur Rehman Qamar
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आँख
में
नम
तक
आ
पहुँचा
हूँ
उसके
ग़म
तक
आ
पहुँचा
हूँ
पहली
बार
मुहब्बत
की
थी
आख़री
दम
तक
आ
पहुँचा
हूँ
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Khalil Ur Rehman Qamar
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अपनी
आँखों
में
'क़मर'
झाँक
के
कैसे
देखूँ
मुझ
से
देखे
हुए
मंज़र
नहीं
देखे
जाते
Khalil Ur Rehman Qamar
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जैसे
हर
ज़ेहन
को
ज़ंजीर
से
डर
लगता
है
पीर-ओ-मुर्शद
मुझे
हर
पीर
से
डर
लगता
है
मक़्तब-ए-फ़िक्र
की
बोहतात
जहाँ
होती
है
तर्जुमा
ठीक
है
तफ़सीर
से
डर
लगता
है
जिस
में
तक़दीर
बदलने
की
सहूलत
न
मिले
ऐसी
लिक्खी
हुई
तक़दीर
से
डर
लगता
है
जिस
सेे
चुप
चाप
ज़मीरों
को
सुलाया
जाए
ऐसे
कम-ज़र्फ़
की
तक़दीर
से
डर
लगता
है
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Khalil Ur Rehman Qamar
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मैं
समझा
था
तुम
हो
तो
क्या
और
माँगू
मेरी
ज़िन्दगी
में
मेरी
आस
तुम
हो
ये
दुनिया
नहीं
है
मेरे
पास
तो
क्या
मेरा
ये
भरम
था
मेरे
पास
तुम
हो
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Khalil Ur Rehman Qamar
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