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Khalil Ur Rehman Qamar
jaise har zehan ko zanjeer se dar lagta hai
jaise har zehan ko zanjeer se dar lagta hai | जैसे हर ज़ेहन को ज़ंजीर से डर लगता है
- Khalil Ur Rehman Qamar
जैसे
हर
ज़ेहन
को
ज़ंजीर
से
डर
लगता
है
पीर-ओ-मुर्शद
मुझे
हर
पीर
से
डर
लगता
है
मक़्तब-ए-फ़िक्र
की
बोहतात
जहाँ
होती
है
तर्जुमा
ठीक
है
तफ़सीर
से
डर
लगता
है
जिस
में
तक़दीर
बदलने
की
सहूलत
न
मिले
ऐसी
लिक्खी
हुई
तक़दीर
से
डर
लगता
है
जिस
सेे
चुप
चाप
ज़मीरों
को
सुलाया
जाए
ऐसे
कम-ज़र्फ़
की
तक़दीर
से
डर
लगता
है
- Khalil Ur Rehman Qamar
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सच
कहें
तो
वो
कहानी
बीच
में
दम
तोड़
देगी
जिस
कहानी
को
सभी
किरदार
छोड़े
जा
रहे
हैं
Anurag Pandey
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तितली
वो
ही
फूल
चुनेगी
जिस
पर
उसका
दिल
आए
इक
लड़की
के
पीछे
इतनी
मारामारी
ठीक
नहीं
Shubham Seth
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इतना
सच
बोल
कि
होंटों
का
तबस्सुम
न
बुझे
रौशनी
ख़त्म
न
कर
आगे
अँधेरा
होगा
Nida Fazli
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इतना
ऊँचा
उड़ना
भी
कुछ
ठीक
नहीं
पाबंदी
लग
जाती
है
परवाज़ों
पर
तुझको
छू
कर
और
किसी
की
चाह
रखे
हैरत
है
और
लानत
है
ऐसे
हाथों
पर
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Varun Anand
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हम
अम्न
चाहते
हैं
मगर
ज़ुल्म
के
ख़िलाफ़
गर
जंग
लाज़मी
है
तो
फिर
जंग
ही
सही
Sahir Ludhianvi
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क्या
ग़लत-फ़हमी
में
रह
जाने
का
सदमा
कुछ
नहीं
वो
मुझे
समझा
तो
सकता
था
कि
ऐसा
कुछ
नहीं
इश्क़
से
बच
कर
भी
बंदा
कुछ
नहीं
होता
मगर
ये
भी
सच
है
इश्क़
में
बंदे
का
बचता
कुछ
नहीं
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Tehzeeb Hafi
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सच
की
डगर
पे
जब
भी
रक्खे
क़दम
किसी
ने
पहले
तो
देखी
ग़ुर्बत
फिर
तख़्त-ओ-ताज
देखा
Amaan Pathan
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ईद
ख़ुशियों
का
दिन
सही
लेकिन
इक
उदासी
भी
साथ
लाती
है
ज़ख़्म
उभरते
हैं
जाने
कब
कब
के
जाने
किस
किस
की
याद
आती
है
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Farhat Ehsaas
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ऐ
दिल
की
ख़लिश
चल
यूँँही
सही
चलता
तो
हूँ
उन
की
महफ़िल
में
उस
वक़्त
मुझे
चौंका
देना
जब
रंग
पे
महफ़िल
आ
जाए
Behzad Lakhnavi
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ये
सच
है
कि
पाँवों
ने
बहुत
कष्ट
उठाए
पर
पाँव
किसी
तरह
राहों
पे
तो
आए
Dushyant Kumar
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तुम
भी
वैसे
थे
मगर
तुम
को
ख़ुदा
रहने
दिया
इस
तरह
तुम
को
ज़माने
से
जुदा
रहने
दिया
Khalil Ur Rehman Qamar
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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अपनी
आँखों
में
'क़मर'
झाँक
के
कैसे
देखूँ
मुझ
से
देखे
हुए
मंज़र
नहीं
देखे
जाते
Khalil Ur Rehman Qamar
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कुछ
न
रह
सका
जहाँ
विरानियाँ
तो
रह
गईं
तुम
चले
गए
तो
क्या
कहानियाँ
तो
रह
गईं
Khalil Ur Rehman Qamar
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ये
लौह-ए-इश्क़
पे
लिखा
है
तेरे
शहर
के
लोग
वफ़ा
से
जीत
भी
जाएँ
तो
हार
जाएँगे
वो
जिन
के
हाथ
में
काग़ज़
की
कश्तियाँ
होंगी
सुना
है
चंद
वही
लोग
पार
जाएँगे
किताब-ए-ज़र्फ़-ए-मोहब्बत
पे
हाथ
रख
के
कहो
सवाल
जान
का
आया
तो
वार
जाएँगे
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Khalil Ur Rehman Qamar
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