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Khalil Ur Rehman Qamar
ye lauh-e-ishq pe likha hai tere shahar ke log
ye lauh-e-ishq pe likha hai tere shahar ke log | ये लौह-ए-इश्क़ पे लिखा है तेरे शहर के लोग
- Khalil Ur Rehman Qamar
ये
लौह-ए-इश्क़
पे
लिखा
है
तेरे
शहर
के
लोग
वफ़ा
से
जीत
भी
जाएँ
तो
हार
जाएँगे
वो
जिन
के
हाथ
में
काग़ज़
की
कश्तियाँ
होंगी
सुना
है
चंद
वही
लोग
पार
जाएँगे
किताब-ए-ज़र्फ़-ए-मोहब्बत
पे
हाथ
रख
के
कहो
सवाल
जान
का
आया
तो
वार
जाएँगे
- Khalil Ur Rehman Qamar
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हम
हार
गए
तुम
जीत
गए
हम
ने
खोया
तुम
ने
पाया
इन
छोटी
छोटी
बातों
का
हम
कोई
ख़याल
नहीं
करते
Wali Aasi
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तू
अपने
घर
में
मुहब्बत
की
जीत
पर
ख़ुश
है
अभी
ठहर
के
मेरा
ख़ानदान
बाक़ी
है
Siraj Faisal Khan
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खेल
ज़िंदगी
के
तुम
खेलते
रहो
यारो
हार
जीत
कोई
भी
आख़िरी
नहीं
होती
Hastimal Hasti
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हार
हो
जाती
है
जब
मान
लिया
जाता
है
जीत
तब
होती
है
जब
ठान
लिया
जाता
है
Shakeel Azmi
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इस
आरज़ी
दुनिया
में
हर
बात
अधूरी
है
हर
जीत
है
ला-हासिल
हर
मात
अधूरी
है
Ambreen Haseeb Ambar
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गर
बाज़ी
इश्क़
की
बाज़ी
है,
जो
चाहो
लगा
दो
डर
कैसा
गर
जीत
गए
तो
क्या
कहना,
हारे
भी
तो
बाज़ी
मात
नहीं
Faiz Ahmad Faiz
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अब
इसको
अपनी
हार
कहूँ
या
कहूँ
मैं
जीत
रूठा
हुआ
था
मैं,
वो
मना
ले
गया
मुझे
Krishna Bihari Noor
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जिसे
तुम
बावरा
कहती
थी
राधे
महाभारत
जीता
के
आ
गया
है
Arvind Inaayat
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मुझ
से
मत
पूछो
के
उस
शख़्स
में
क्या
अच्छा
है
अच्छे
अच्छों
से
मुझे
मेरा
बुरा
अच्छा
है
किस
तरह
मुझ
से
मुहब्बत
में
कोई
जीत
गया
ये
न
कह
देना
के
बिस्तर
में
बड़ा
अच्छा
है
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Tehzeeb Hafi
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'नबील'
इस
इश्क़
में
तुम
जीत
भी
जाओ
तो
क्या
होगा
ये
ऐसी
जीत
है
पहलू
में
जिस
के
हार
चलती
है
Aziz Nabeel
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मैं
समझा
था
तुम
हो
तो
क्या
और
माँगू
मेरी
ज़िन्दगी
में
मेरी
आस
तुम
हो
ये
दुनिया
नहीं
है
मेरे
पास
तो
क्या
मेरा
ये
भरम
था
मेरे
पास
तुम
हो
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Khalil Ur Rehman Qamar
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ख़िलाफ़-ए-शर्त-ए-अना
था
वो
ख़्वाब
में
भी
मिले
मैं
नींद
नींद
को
तरसा
मगर
नहीं
सोया
ख़िलाफ़-ए-मौसम-ए-दिल
था
कि
थम
गई
बारिश
ख़िलाफ़-ए-ग़ुर्बत-ए-ग़म
है
कि
मैं
नहीं
रोया
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Khalil Ur Rehman Qamar
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ख़्वाब
पलकों
की
हथेली
पे
चुने
रहते
हैं
कौन
जाने
वो
कभी
नींद
चुराने
आए
मुझ
पे
उतरे
मेरे
अल्हाम
की
बारिश
बन
कर
मुझ
को
इक
बूॅंद
समुंदर
में
छुपाने
आए
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Khalil Ur Rehman Qamar
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तेरे
दिल
के
निकाले
हम
कहाँ
भटके
कहाँ
पहुँचे
मगर
भटके
तो
याद
आया
भटकना
भी
ज़रूरी
था
Khalil Ur Rehman Qamar
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लफ़्ज़
कितने
ही
तेरे
पैरों
से
लिपटे
होंगे
तूने
जब
आख़िरी
ख़त
मेरा
जलाया
होगा
तूने
जब
फूल
किताबों
से
निकाले
होंगे
देने
वाला
भी
तुझे
याद
तो
आया
होगा
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Khalil Ur Rehman Qamar
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