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Karan Sahar
aadhi raat guzarne ko hai
aadhi raat guzarne ko hai | आधी रात गुज़रने को है
- Karan Sahar
आधी
रात
गुज़रने
को
है
कमरा
ख़्वाब
से
भरने
को
है
- Karan Sahar
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बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल
है
दुनिया
मिरे
आगे
होता
है
शब-ओ-रोज़
तमाशा
मिरे
आगे
Mirza Ghalib
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जागना
और
जगा
के
सो
जाना
रात
को
दिन
बना
के
सो
जाना
Ali Zaryoun
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खिड़कियों
से
झाँकती
है
रौशनी
बत्तियाँ
जलती
हैं
घर
घर
रात
में
Mohammad Alvi
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फिर
से
मिलने
आ
गईं
तन्हाइयाँ
क्यूँँ
नहीं
खुलते
हैं
दफ़्तर
रात
में
Vikram Sharma
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उम्र
शायद
न
करे
आज
वफ़ा
काटना
है
शब-ए-तन्हाई
का
Altaf Hussain Hali
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सोचता
हूँ
कि
उस
की
याद
आख़िर
अब
किसे
रात
भर
जगाती
है
Jaun Elia
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जब
तुझे
याद
कर
लिया
सुब्ह
महक
महक
उठी
जब
तेरा
ग़म
जगा
लिया
रात
मचल
मचल
गई
Faiz Ahmad Faiz
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दिन
ढल
गया
और
रात
गुज़रने
की
आस
में
सूरज
नदी
में
डूब
गया,
हम
गिलास
में
Rahat Indori
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रात
का
इंतिज़ार
कौन
करे
आज
कल
दिन
में
क्या
नहीं
होता
Bashir Badr
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रात
बाक़ी
थी
जब
वो
बिछड़े
थे
कट
गई
उम्र
रात
बाक़ी
है
Khumar Barabankvi
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वस्ल
की
बात
ही
नहीं
होती
इस
तरह
आशिक़ी
नहीं
होती
आग
ख़ुद
को
लगाए
बैठा
हूँ
फिर
भी
क्यूँ
रौशनी
नहीं
होती
हिज्र
में
ही
तो
ये
सहूलत
है
वस्ल
में
शा'इरी
नहीं
होती
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Karan Sahar
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फिर
उन
सेे
दिल
लगा
कर
देखते
हैं
नए
रिश्ते
बना
कर
देखते
हैं
बड़ा
ज़रख़ेज़
है
दामन
तुम्हारा
कोई
आँसू
गिरा
कर
देखते
हैं
नए
तो
कुछ
नहीं
लगते
कि
जब
हम
पुराने
ग़म
उठा
कर
देखते
हैं
ये
किसके
नूर
से
रौशन
है
कमरा
चराग़ों
को
बुझा
कर
देखते
हैं
ग़ज़ल
में
कुछ
कमी
सी
लग
रही
है
तुम्हें
शे'रों
में
ला
कर
देखते
हैं
मज़े
की
बात
ये
है
फूल
भी
अब
तुम्हें
ही
मुस्कुरा
कर
देखते
हैं
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Karan Sahar
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आरज़ू
थी
कि
कभी
उसके
बराबर
बैठूँ
और
इतना
ही
नहीं
हाथ
पकड़
कर
बैठूँ
तेरी
दुनिया
में
पस-ओ-पेश
बहुत
हैं
साक़ी
इस
से
बेहतर
है
कि
मैं
शे'र
कहूँ
घर
बैठूँ
तुम
तो
मसरूफ़
बहुत
रहने
लगे
हो
ख़ुद
में
मुंतज़िर
हूँ
मैं,
अगर
तुम
कहो
बाहर
बैठूँ
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Karan Sahar
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दूर
तलक
था
गहरा
पानी
पीली
धूप
सुनहरा
पानी
कितना
सूना
मंज़र
गुज़रा
मानो
आँख
में
ठहरा
पानी
कश्ती
अपना
ग़म
कहती
हैं
सुनता
कुछ
नईं
बेहरा
पानी
नीचे
ख़ूब
ख़ज़ाने
होंगे
उन
के
ऊपर
पहरा
पानी
उगते
सूरज
की
अँगड़ाई
ढलती
शाम
का
चेहरा
पानी
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Karan Sahar
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तेरे
बारे
में
क्या
नहीं
कहते
बस
तेरे
मुँह
पे
जा
नहीं
कहते
जो
हमें
ख़ुदस
दूर
ले
जाए
हम
उसे
रास्ता
नहीं
कहते
आप
हैं
तो
अगरचे
फिर
भी
हम
आपको
बे-वफ़ा
नहीं
कहते
चाहे
जितने
बुरे
त'अल्लुक़
हों
जाने
वाले
को
जा
नहीं
कहते
सारी
बातें
सुनी
सुनाई
हैं
आप
कुछ
भी
नया
नहीं
कहते
यूँँ
तो
हम
हिज्र
के
पुजारी
हैं
वस्ल
को
भी
बुरा
नहीं
कहते
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Karan Sahar
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