meri subh-e-gham bala se kabhi shaam tak na pahunche | मेरी सुब्ह-ए-ग़म बला से कभी शाम तक न पहुंचे

  - Kaleem Aajiz
मेरीसुब्ह-ए-ग़मबलासेकभीशामतकपहुंचे
मुझेडरयेहैबुराईतेरेनामतकपहुंचे
मेरेपासक्यावोआतेमेरादर्दक्यामिटाते
मेराहालदेखनेकोलब-ए-बामतकपहुंचे
होकिसीकामुझपेएहसांयेनहींपसंदमुझको
तेरीसुब्हकीतजल्लीमेरीशामतकपहुंचे
तेरीबेरुख़ीपेज़ालिममेराजीयेचाहताहै
किवफ़ाकामेरेलबपरकभीनामतकपहुंचे
मैंफ़ुग़ान-ए-बे-असरकाकभीमोतरिफ़नहींहूँ
वोसदाहीक्याजोउनकेदर-ओ-बामतकपहुंचे
वोसनमबिगड़केमुझसेमेराक्याबिगाड़लेगा
कभीराज़खोलदूँ
मैंतोसलामतकपहुंचे
मुझेलज़्ज़त-ए-असीरीकासबक़पढ़ारहेहैं
जोनिकलकेआशियांसेकभीदामतकपहुंचे
उन्हेंमेहरबांसमझलेंमुझेक्याग़रज़पड़ीहै
वोकरमकाहाथहीक्याजोअवामतकपहुंचे
हुएफ़ैज़-ए-मय-कदाससभीफ़ैज़याबलेकिन
जोग़रीबतिश्ना-लबथेवहीजामतकपहुंचे
जिसेमैंनेजगमगायाउसीअंजुमनमेंसाक़ी
मेराज़िक्रतकआएमेरानामतकपहुंचे
तुम्हेंयादहीआऊंयेहैऔरबातवर्ना
मैंनहींहूंदूरइतनाकिसलामतकपहुंचे
  - Kaleem Aajiz
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