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"Nadeem khan' Kaavish"
hamaara ik sahaara tha
hamaara ik sahaara tha | हमारा इक सहारा था
- "Nadeem khan' Kaavish"
हमारा
इक
सहारा
था
उसी
से
बस
गुज़ारा
था
ये
जो
आँखें
हैं
ना
तेरी
यहाँ
इक
घर
हमारा
था
कभी
शा
में
सुहानी
थी
कभी
सूरज
इशारा
था
तू
जब
तक
साथ
था
मेरे
हाँ
हर
ग़म
मुझ
सेे
हारा
था
तेरे
ख़ातिर
जहाँ
डूबा
वो
दरिया
भी
किनारा
था
नज़र
में
हुस्न
लाखों
थे
हमें
पर
वो
ही
प्यारा
था
कहीं
भी
दिल
न
लग
पाया
तेरा
जाना
ख़सारा
था
उसी
ने
फिर
उजाड़ा
यार
जिसे
हमने
सँवारा
था
अलग
ही
नूर
था
इस
में
मेरा
चेहरा
सितारा
था
कहानी
तक
लिखी
तुझपर
ग़ज़ल
तक
में
उतारा
था
वो
शायर
मर
गया
इक
दिन
अली
जिसका
सहारा
था
- "Nadeem khan' Kaavish"
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ऐ
आ
समाँ
किस
लिए
इस
दर्जा
बरहमी
हम
ने
तो
तिरी
सम्त
इशारा
नहीं
किया
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Ambreen Haseeb Ambar
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मुंतज़िर
हूँ
कि
सितारों
की
ज़रा
आँख
लगे
चाँद
को
छत
पे
बुला
लूँगा
इशारा
कर
के
Rahat Indori
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इशारों
ही
में
हाल-ए-दिल
मैं
सारा
खोल
जाता
हूँ
बहुत
ख़ामोश
रहकर
भी
बहुत
कुछ
बोल
जाता
हूँ
Dhiraj Singh 'Tahammul'
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उसी
वक़्त
अपने
क़दम
मोड़
लेना
नदी
पार
से
जब
इशारा
करूँँगा
Siddharth Saaz
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जैसे
तू
हुक्म
करे
दिल
मिरा
वैसे
धड़के
ये
घड़ी
तेरे
इशारों
से
मिला
रक्खी
है
Anwar Masood
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भाँप
ही
लेंगे
इशारा
सर-ए-महफ़िल
जो
किया
ताड़ने
वाले
क़यामत
की
नज़र
रखते
हैं
Lala Madhav Ram Jauhar
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जो
उस
तरफ़
से
इशारा
कभी
किया
उस
ने
मैं
डूब
जाऊंगा
दरिया
को
पार
करते
हुए
Ghulam Murtaza Rahi
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इशारा
कर
रहे
हैं
बाल
ये
बिखरे
हुए
क्या
तू
मेरे
पास
आया
है
कहीं
होते
हुए
क्या
ये
इतना
हँसने
वाले
इश्क़
में
टूटे
हुए
लोग
तू
इन
से
पूछना
अंदर
से
भी
अच्छे
हुए
क्या
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Kushal Dauneria
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प्यार
करने
की
हिम्मत
नहीं
उनके
पास
और
हम
सेे
किनारा
भी
होता
नहीं
बात
सीधे
कही
भी
नहीं
जा
रही
और
कोई
इशारा
भी
होता
नहीं
उसको
उम्मीद
है
ऐश
होगी
बसर
साथ
में
जब
रहेगी
मिरे
वो
मगर
मुझपे
जितनी
मुहब्बत
बची
है
सखी
इतने
में
तो
गुज़ारा
भी
होता
नहीं
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Divyansh "Dard" Akbarabadi
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कोई
इशारा
दिलासा
न
कोई
वा'दा
मगर
जब
आई
शाम
तिरा
इंतिज़ार
करने
लगे
Waseem Barelvi
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कई
रास्तों
की
थकन
है
बदन
में
मैं
मंज़िल
पे
आकर
भी
पछता
रहा
हूँ
"Nadeem khan' Kaavish"
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मुसलसल
हादसों
से
आ
रहा
हूँ
किसी
मय्यत
पे
अब
हैरत
नहीं
है
"Nadeem khan' Kaavish"
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किसी
की
लाश
खाती
है
किसी
का
ख़ून
पीती
है
बहुत
खूॅंखार
है
दुनिया
बहुत
प्यासी
ज़मीं
है
अब
"Nadeem khan' Kaavish"
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कभी
शा
में
सुहानी
थीं
कभी
सूरज
इशारा
था
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"Nadeem khan' Kaavish"
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बिना
पापा
के
ये
घर
अब
मुझे
घर
ही
नहीं
लगता
नहीं
आता
य़कीं
तो
क़ब्र
कहती
है
य़कीं
है
अब?
"Nadeem khan' Kaavish"
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