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Jitendra "jeet"
nahin hai chaah jismoon ki na daulat chahiye teri
nahin hai chaah jismoon ki na daulat chahiye teri | नहीं है चाह जिस्मों की न दौलत चाहिए तेरी
- Jitendra "jeet"
नहीं
है
चाह
जिस्मों
की
न
दौलत
चाहिए
तेरी
मिले
दिल
में
जगह
तेरे
वहीं
दुनिया
बसा
लूँगा
- Jitendra "jeet"
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मैं
चाहता
यही
था
सब
चाह
ख़त्म
हो
अब
फिर
चाहकर
तुम्हें
बदला
ये
ख़याल
मेरा
Abhay Aadiv
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हमें
इस
मिट्टी
से
कुछ
यूँँ
मुहब्बत
है
यहीं
पे
निकले
दम
दिल
की
ये
हसरत
है
हमें
क्यूँ
चाह
उस
दुनिया
की
हो
मौला
हमारी
तो
इसी
मिट्टी
में
जन्नत
है
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Harsh saxena
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भटकती
रूहों
का
बोझ
कब
तक
कोई
उठाता
कहीं
ठहरता,पनाह
लेता,
तो
साथ
होता
मैं
जिस
'अक़ीदत
के
साथ
उसको
भुला
रहा
हूँ
उसी
'अक़ीदत
से
चाह
लेता,
तो
साथ
होता
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Armaan khan
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अगरचे
इश्क़
में
मजनू
बड़े
बदनाम
होते
हैं
अगरचे
क़ैस
जैसे
आशिक़ों
के
नाम
होते
हैं
भटक
सकती
नहीं
जंगल
में
लैला
चाह
करके
भी
अजी
लैला
को
घर
में
दूसरे
भी
काम
होते
हैं
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Gagan Bajad 'Aafat'
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ज़रा
पाने
की
चाहत
में
बहुत
कुछ
छूट
जाता
है
नदी
का
साथ
देता
हूँ
समुंदर
रूठ
जाता
है
Aalok Shrivastav
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ज़िंदगी
में
तब
से
चाहत
की
रही
नइँ
जुस्तुजू
जब
से
हमने
आपसे
पहली
दफ़ा
की
गुफ़्तगू
Bhawna Bhatt
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काम
के
बोझ
तले
दब
गए
तो
समझे
हम
लोग
क्यूँँ
चाह
के
भी
दिल
का
नहीं
कर
पाते
Jangveer Singh Rakesh
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मुझे
चाह
थी
किसी
और
की,
प
मुझे
मिला
कोई
और
है
मेरी
ज़िन्दगी
का
है
और
सच,
मेरे
ख़्वाब
सा
कोई
और
है
तू
क़रीब
था
मेरे
जिस्म
के,
बड़ा
दूर
था
मेरी
रूह
से
तू
मेरे
लिए
मेरे
हमनशीं
कोई
और
था
कोई
और
है
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Avtar Singh Jasser
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सजा
है
प्रेम
का
उपवन
तुम्हीं
से
हमारी
चाह
है
पावन
तुम्हीं
से
सभी
में
प्रेम
देखें
प्रेम
चाहें
मिली
है
ये
मुझे
चितवन
तुम्हीं
से
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Vikas Sahaj
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पुरानी
चाहत
के
ज़ख़्म
अब
तक
भरे
नहीं
हैं
और
एक
लड़की
पड़ी
है
पीछे
बड़े
जतन
से
Ashu Mishra
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उसने
इक
हद
तक
जाना
था
मुझको
जिस
हद
तक
उसने
पाना
था
मुझको
Jitendra "jeet"
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हम
नहीं
थे
तेरे
दुश्मनों
में
तूने
समझा
नहीं
दोस्तों
में
वो
जो
महफ़िल
में
तन्हा
नहीं
था
कैसे
रोता
है
तन्हाइयों
में
रक़्स
करता
है
धड़कन
में
ऐसे
इक
तवायफ़
करे
घुँघरुओं
में
ख़ुद-कुशी
भी
नहीं
कर
सके
वो
जो
बंधे
हैं
कई
बंधनों
में
जिसने
थोपे
हुए
को
न
माना
उसकी
गिनती
हुई
सरफिरों
में
कितनो
हिस्सों
में
मैं
बँट
गया
हूँ
टूटकर
देखा
है
आइनों
में
आज
उनको
ज़रूरत
मेरी
जो
गिन
रहे
थे
मुझे
पागलों
में
दर्द
को
मेरे
कैसे
समझता
वो
जो
बैठा
नहीं
शायरों
में
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Jitendra "jeet"
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बारिश
में
तो
ये
आँखें
खुलकर
रोती
हैं
मैंने
थैले
में
अपने
छाता
रक्खा
है
Jitendra "jeet"
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हम
महफ़िल
में
ज़ख़्म
दिखाने
आए
हैं
टूटे
दिल
का
हाल
सुनाने
आए
हैं
Jitendra "jeet"
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चलो
राहे
मुहब्बत
में
तू
इतना
याद
रख
लेना
दिलों
का
ख़ून
पीती
ये
जिगर
का
माँस
खाती
है
Jitendra "jeet"
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