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Jitendra "jeet"
main ne dhoke bhi pag pag pe kh
main ne dhoke bhi pag pag pe kh | मैं ने धोके भी पग पग पे खाए हैं
- Jitendra "jeet"
मैं
ने
धोके
भी
पग
पग
पे
खाए
हैं
तब
जाकर
हम
ने
ये
तजरबे
पाए
हैं
फल
खाने
में
जितना
मीठा
होता
है
उस
पर
उतने
ही
चाक़ू
के
साए
हैं
कैसे
बात
करोगे
तुम
अपने
हक़
की
तुम
ने
तो
ख़ुद
औरों
के
हक़
खाए
हैं
तेरे
घर
ख़ुशियों
की
बारिश
होनी
है
मेरे
घर
में
ग़म
के
बादल
छाए
हैं
शायद
कोई
भूल
हुई
मुझ
सेे
भारी
सारे
दुख
मेरे
हिस्से
में
आए
हैं
- Jitendra "jeet"
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सर्द
झोंकों
से
भड़कते
हैं
बदन
में
शो'ले
जान
ले
लेगी
ये
बरसात
क़रीब
आ
जाओ
Sahir Ludhianvi
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धूप
तो
धूप
ही
है
इसकी
शिकायत
कैसी
अब
की
बरसात
में
कुछ
पेड़
लगाना
साहब
Nida Fazli
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वो
अजब
शख़्स
था
हर
हाल
में
ख़ुश
रहता
था
उस
ने
ता-उम्र
किया
हँस
के
सफ़र
बारिश
में
Sahiba sheharyaar
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मेरी
आँखों
से
बारिश
पूछती
है
तुम्हारा
क्या
कोई
मौसम
नहीं
है
100rav
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जाने
कैसे
ख़ुश
रहने
की
आदत
डाली
जाती
है
उनके
यहाँ
तो
बारिश
में
भी
धूप
निकाली
जाती
है
Ritesh Rajwada
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उस
लड़की
से
बस
अब
इतना
रिश्ता
है
मिल
जाए
तो
बात
वगैरा
करती
है
बारिश
मेरे
रब
की
ऐसी
नेमत
है
रोने
में
आसानी
पैदा
करती
है
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Tehzeeb Hafi
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मेहरबाँ
हम
पे
हर
इक
रात
हुआ
करती
थी
आँख
लगते
ही
मुलाक़ात
हुआ
करती
थी
हिज्र
की
रात
है
और
आँख
में
आँसू
भी
नहीं
ऐसे
मौसम
में
तो
बरसात
हुआ
करती
थी
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Ismail Raaz
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दिन
में
मिल
लेते
कहीं
रात
ज़रूरी
थी
क्या?
बेनतीजा
ये
मुलाक़ात
ज़रूरी
थी
क्या
मुझ
सेे
कहते
तो
मैं
आँखों
में
बुला
लेता
तुम्हें
भीगने
के
लिए
बरसात
ज़रूरी
थी
क्या
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Abrar Kashif
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बाजी
बदी
थी
उसने
मेरे
चश्मे-तर
के
साथ
आख़िर
को
हार
हार
के
बरसात
रह
गई
Khwaja Meer Dard
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तुम्हारे
पास
आते
हैं
तो
साँसें
भीग
जाती
हैं
मोहब्बत
इतनी
मिलती
है
कि
आँखें
भीग
जाती
हैं
तबस्सुम
इत्र
जैसा
है
हँसी
बरसात
जैसी
है
वो
जब
भी
बात
करती
है
तो
बातें
भीग
जाती
हैं
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Aalok Shrivastav
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लोग
आए
खेल
खेले
चल
दिए
हम
थे
तन्हा
और
तन्हा
हो
गए
Jitendra "jeet"
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हम
महफ़िल
में
ज़ख़्म
दिखाने
आए
हैं
टूटे
दिल
का
हाल
सुनाने
आए
हैं
Jitendra "jeet"
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तुमको
हमारी
याद
का
सदक़ा
नहीं
रहा
तबसे
हमारा
हाल
भी
अच्छा
नहीं
रहा
Jitendra "jeet"
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साथ
में
होकर
भी
तन्हा
थे
हम
दोनों
कुछ
इस
तरह
से
ग़ुस्सा
थे
हम
दोनों
आज
जो
आँखें
सूख
गई
हैं
हमारी
एक
समय
पहले
दरिया
थे
हम
दोनों
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Jitendra "jeet"
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हम
नहीं
थे
तेरे
दुश्मनों
में
तूने
समझा
नहीं
दोस्तों
में
वो
जो
महफ़िल
में
तन्हा
नहीं
था
कैसे
रोता
है
तन्हाइयों
में
रक़्स
करता
है
धड़कन
में
ऐसे
इक
तवायफ़
करे
घुँघरुओं
में
ख़ुद-कुशी
भी
नहीं
कर
सके
वो
जो
बंधे
हैं
कई
बंधनों
में
जिसने
थोपे
हुए
को
न
माना
उसकी
गिनती
हुई
सरफिरों
में
कितनो
हिस्सों
में
मैं
बँट
गया
हूँ
टूटकर
देखा
है
आइनों
में
आज
उनको
ज़रूरत
मेरी
जो
गिन
रहे
थे
मुझे
पागलों
में
दर्द
को
मेरे
कैसे
समझता
वो
जो
बैठा
नहीं
शायरों
में
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Jitendra "jeet"
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