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Jameel Azimabadi
jhuki jhuki si nazrein
jhuki jhuki si nazrein | झुकी झुकी सी नज़रें
- Jameel Azimabadi
झुकी
झुकी
सी
नज़रें
क्यूँ
हैं
उड़ी
उड़ी
सी
रंगत
क्यूँ
है
चुप
चुप
क्यूँ
हैं
ख़ौफ़
के
मारे
गुम-सुम
का
क्यूँ
रूप
हैं
धारे
ये
घर
तो
हम
सब
का
घर
है
खुला
हुआ
जिस
घर
का
दर
है
शाहों
का
दरबार
नहीं
है
पीरों
की
दरगाह
नहीं
है
माँगें
हम
बे-रोक
जो
चाहें
सब
पर
ये
दरबार
खुला
है
गोरे
काले
एक
हैं
सारे
राजा
प्रजा
हाथ
पसारे
हम
भी
कह
दें
जो
कहना
है
डरते
क्यूँ
हैं
ये
वो
दर
है
जिस
के
आगे
एक
हैं
सारे
झूटे
हैं
सब
और
सहारे
- Jameel Azimabadi
मुझे
ये
डर
है
तेरी
आरज़ू
न
मिट
जाए
बहुत
दिनों
से
तबीअत
मिरी
उदास
नहीं
Nasir Kazmi
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हम
वो
हैं
जो
नइँ
डरते
वक़्त
के
इम्तिहान
से
वो
परिंदे
और
थे
जो
डर
गए
आसमान
से
Madhav
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मैं
कैसे
मान
लूँ
कि
इश्क़
बस
इक
बार
होता
है
तुझे
जितनी
दफ़ा
देखूँ
मुझे
हर
बार
होता
है
तुझे
पाने
की
हसरत
और
डर
ना-कामियाबी
का
इन्हीं
दो
तीन
बातों
से
ये
दिल
दो
चार
होता
है
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Bhaskar Shukla
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दिया
जला
के
सभी
बाम-ओ-दर
में
रखते
हैं
और
एक
हम
हैं
इसे
रह-गुज़र
में
रखते
हैं
समुंदरों
को
भी
मालूम
है
हमारा
मिज़ाज
कि
हम
तो
पहला
क़दम
ही
भँवर
में
रखते
हैं
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Abrar Kashif
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कुछ
न
था
मेरे
पास
खोने
को
तुम
मिले
हो
तो
डर
गया
हूँ
मैं
Nomaan Shauque
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हमीं
को
क़ातिल
कहेगी
दुनिया
हमारा
ही
क़त्ल-ए-आम
होगा
हमीं
कुएँ
खोदते
फिरेंगे
हमीं
पे
पानी
हराम
होगा
अगर
यही
ज़ेहनियत
रही
तो
मुझे
ये
डर
है
कि
इस
सदी
में
न
कोई
अब्दुल
हमीद
होगा
न
कोई
अब्दुल
कलाम
होगा
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Meraj Faizabadi
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ख़ुदा,
फ़रिश्ते,
पयम्बर,
बशर
किसी
का
नहीं
मुझे
लिहाज़
तो
सबका
है
डर
किसी
का
नहीं
Charagh Sharma
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और
हुआ
भी
ठीक
वो
ही
जिसका
डर
था
बोझ
इतना
रख
दिया
था
बुलबुले
पर
Siddharth Saaz
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नई
सुब्ह
पर
नज़र
है
मगर
आह
ये
भी
डर
है
ये
सहर
भी
रफ़्ता
रफ़्ता
कहीं
शाम
तक
न
पहुँचे
Shakeel Badayuni
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हुनर
से
काम
लिया
पेंट
ब्रश
नहीं
तोड़ा
बना
लिया
तेरे
जैसा
ही
कोई
रंगों
से
मुझे
ये
डर
है
कि
मिल
जाएगी
तो
रो
दूँगा
मैं
जिस
ख़ुशी
को
तरसता
रहा
हूँ
बरसों
से
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Rahul Gurjar
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