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Jai Raj Singh Jhala
baarha bas mujhe yuñ lagta hai
baarha bas mujhe yuñ lagta hai | बारहा बस मुझे यूँँ लगता है
- Jai Raj Singh Jhala
बारहा
बस
मुझे
यूँँ
लगता
है
है
कोई
जो
मुझे
ही
तकता
है
ख़्वाब
रातों
में
ख़्वाब
में
आ
कर
ख़्वाब
की
ही
तरह
बिखरता
है
रौशनाई
निगल
गया
था
जो
साया
वो
आँखों
में
खटकता
है
दिन
के
सन्नाटे
में
क़रीब
आ
कर
रम्ज़
पेशानी
पर
टहलता
है
ऐ
ज़मीं
प्यासी
ही
रहेगी
तू
आसमाँ
से
धुआँ
बरसता
है
कोई
बू
ख़ाक
कर
गई
शायद
देख
फूलों
को
जी
मचलता
है
ग़म-तलब
कब
तलक
रहे
कोई
अब
लहू
आँखों
से
टपकता
है
- Jai Raj Singh Jhala
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तसव्वुर
में
भी
अब
वो
बे-नक़ाब
आते
नहीं
मुझ
तक
क़यामत
आ
चुकी
है
लोग
कहते
हैं
शबाब
आया
Hafeez Jalandhari
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रात
भर
उन
का
तसव्वुर
दिल
को
तड़पाता
रहा
एक
नक़्शा
सामने
आता
रहा
जाता
रहा
Akhtar Shirani
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ग़म-ए-ज़माना
ने
मजबूर
कर
दिया
वर्ना
ये
आरज़ू
थी
कि
बस
तेरी
आरज़ू
करते
Akhtar Shirani
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बढ़
के
इम्कान
से
नुक़्सान
उठाए
हुए
हैं
हम
मुहब्बत
में
बहुत
नाम
कमाए
हुए
हैं
मेरे
मौला
मुझे
ता'बीर
की
दौलत
दे
दे
मैंने
इक
शख़्स
को
कुछ
ख़्वाब
दिखाए
हुए
हैं
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Ejaz Tawakkal Khan
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ख़्वाब
पलकों
की
हथेली
पे
चुने
रहते
हैं
कौन
जाने
वो
कभी
नींद
चुराने
आए
मुझ
पे
उतरे
मेरे
अल्हाम
की
बारिश
बन
कर
मुझ
को
इक
बूॅंद
समुंदर
में
छुपाने
आए
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Khalil Ur Rehman Qamar
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भरे
हुए
जाम
पर
सुराही
का
सर
झुका
तो
बुरा
लगेगा
जिसे
तेरी
आरज़ू
नहीं
तू
उसे
मिला
तो
बुरा
लगेगा
ये
आख़िरी
कंपकंपाता
जुमला
कि
इस
तअ'ल्लुक़
को
ख़त्म
कर
दो
बड़े
जतन
से
कहा
है
उस
ने
नहीं
किया
तो
बुरा
लगेगा
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Zubair Ali Tabish
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नींद
भी
जागती
रही
पूरे
हुए
न
ख़्वाब
भी
सुब्ह
हुई
ज़मीन
पर
रात
ढली
मज़ार
में
Adil Mansuri
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बहाने
और
भी
होते
जो
ज़िंदगी
के
लिए
हम
एक
बार
तिरी
आरज़ू
भी
खो
देते
Majrooh Sultanpuri
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यही
तलब
है
जो
जीना
सिखाए
जाती
है
तुम्हारे
ख़्वाब
न
देखें
तो
कब
के
मर
जाएँ
Subhan Asad
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ख़मोशी
मेरी
मअनी-ख़ेज़
थी
ऐ
आरज़ू
कितनी
कि
जिस
ने
जैसा
चाहा
वैसा
अफ़्साना
बना
डाला
Arzoo Lakhnavi
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बंदगी
में
जो
हबीबों
की
रहा
सर
मेरा
थोपने
के
लिए
इल्ज़ाम
मिला
सर
मेरा
जानते
थे
तो
भी
हालत
का
सबब
जानना
था
सर
झटकते
हुए
मैं
ने
भी
कहा
सर
मेरा
रूह
का
मेरी
न
जाने
था
इरादा
क्या
ही
सुब्ह
जब
मैं
उठा
तो
सोया
मिला
सर
मेरा
सौ
ज़बाँ
पर
सौ
तरीक़े
मिरी
इक
दास्ताँ
के
सौ
सरों
में
है
सौ
हिस्सों
में
बटा
सर
मेरा
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Jai Raj Singh Jhala
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अब
भला
क्या
देखते
हो
आब
में
ग़र्क़
सब
कुछ
हो
गया
गिर्दाब
में
लुत्फ़
मेरी
मौत
का
बढ़
जाए
सो
ज़हर
और
डाला
गया
ज़हराब
में
हो
गई
तब
नूर
से
नफ़रत
मुझे
दाग़
देखे
जब
दिल-ए-महताब
में
मैं
समझता
था
जिन्हें
शीरीं-दहन
सर-ब-सर
भीगे
मिले
तेज़ाब
में
गूँजे
ही
कैसे
भला
साज़-ए-जिगर
ज़ंग
ही
जब
लग
गया
मिज़राब
में
देखने
के
बाद
सारे
क़ाएदे
ऐब
फिर
देखे
गए
एराब
में
ज़ेहन
में
कोई
ख़याल
आता
नहीं
है
रवानी
ही
नहीं
आ'साब
में
इक
ख़ुदास
ही
तवक़्क़ो
थी
फ़क़त
नोक
निकल
आए
मगर
मेहराब
में
ख़ासियत
है
इन
अदब
वालों
में
इक
मार
देते
है
अदब
आदाब
में
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Jai Raj Singh Jhala
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ख़ल्वतों
से
निबाह
कर
आया
ज़िंदगी
को
तबाह
कर
आया
रौशनी
के
थे
सब
मुरीद
सो
मैं
तीरगी
से
निकाह
कर
आया
बे-सबब
सर
धरा
गया
इल्ज़ाम
इस
लिए
मैं
गुनाह
कर
आया
उस
की
ओर
देखा
तक
नहीं
मैं
ने
कोह
का
फ़ख़्र
काह
कर
आया
ज़िक्र
कर
यारों
में
मोहब्बत
का
जंग
की
इफ़्तिताह
कर
आया
देख
कर
मुझ
को
तंज़
कस
रहे
थे
हँस
के
मैं
वाह-वाह
कर
आया
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इन
से
मिल
कर
भी
भला
क्या
कीजिए
पास
बैठे
और
शिकवा
कीजिए
जाइए
उन
से
कहीं
दूर
और
फिर
दूर
रहने
का
इशारा
कीजिए
वो
मनाने
गर
क़रीब
आ
जाए
तो
बे-रुख़ी
में
और
इज़ाफ़ा
कीजिए
ज़िंदगी
से
क्या
परेशाँ
हो
गए
ख़ल्वतों
में
जा
के
चीख़ा
कीजिए
कब
तलक
बरताव
में
तल्ख़ी
रहे
आदतों
का
अब
मुदावा
कीजिए
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Jai Raj Singh Jhala
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दास्ताँ
यूँँ
बदल
गई
होगी
मौज
साहिल
निगल
गई
होगी
तुम
को
शायद
यक़ीं
न
आए
पर
आग
पानी
से
जल
गई
होगी
चंद
पल
रहती
है
अना
उस
की
बर्फ़
बन
कर
पिघल
गई
होगी
हाए
अंजाम
किस
गुमाँ
का
है
ये
शाख़
कुछ
फूल
फल
गई
होगी
रात
भर
आसमान
रोया
था
सुब्ह
सीलन
से
गल
गई
होगी
देख
हालत
मिरी
जबीनें
कई
गिरते
गिरते
सँभल
गई
होगी
मोड़
से
दूरी
पर
खड़ा
हूँ
मैं
गाड़ी
रस्ता
बदल
गई
होगी
घाव
देती
है
अब
वो
मोम
ज़बाँ
ग़ैर
साँचे
में
ढल
गई
होगी
पहले
जो
था
वही
हूँ
मैं
अब
भी
फ़ितरत
उस
की
बदल
गई
होगी
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