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Jagat Singh
kyunkar diwali hai saji vo to abhii aa.e nahin
kyunkar diwali hai saji vo to abhii aa.e nahin | क्यूँँकर दिवाली है सजी वो तो अभी आए नहीं
- Jagat Singh
क्यूँँकर
दिवाली
है
सजी
वो
तो
अभी
आए
नहीं
उनके
बिना
ये
घर
सजे
तो
फिर
सजें
कैसे
बता
- Jagat Singh
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उसे
अभी
भी
मेरे
दिल
के
हाल
का
नहीं
पता
तो
यानी
उसको
अपने
घर
का
रास्ता
नहीं
पता
ये
तेरी
भूल
है
ऐ
मेरे
ख़ुश-ख़याल
के
मुझे
पराई
औरतों
से
तेरा
राब्ता
नहीं
पता
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Ruqayyah Maalik
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घर
में
झीने
रिश्ते
मैंने
लाखों
बार
उधड़ते
देखे
चुपके
चुपके
कर
देती
है
जाने
कब
तुरपाई
अम्मा
Aalok Shrivastav
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तू
अपने
घर
में
मुहब्बत
की
जीत
पर
ख़ुश
है
अभी
ठहर
के
मेरा
ख़ानदान
बाक़ी
है
Siraj Faisal Khan
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लोग
हर
मोड़
पे
रुक
रुक
के
सँभलते
क्यूँँ
हैं
इतना
डरते
हैं
तो
फिर
घर
से
निकलते
क्यूँँ
हैं
मोड़
होता
है
जवानी
का
सँभलने
के
लिए
और
सब
लोग
यहीं
आ
के
फिसलते
क्यूँँ
हैं
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Rahat Indori
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सब
कुछ
तो
है
क्या
ढूँडती
रहती
हैं
निगाहें
क्या
बात
है
मैं
वक़्त
पे
घर
क्यूँँ
नहीं
जाता
Nida Fazli
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जितने
मर्ज़ी
महँगे
पकवानों
को
खालो
तुम
घर
की
रोटी
तो
फिर
घर
की
रोटी
होती
है
Sarvjeet Singh
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किसी
को
घर
से
निकलते
ही
मिल
गई
मंज़िल
कोई
हमारी
तरह
उम्र
भर
सफ़र
में
रहा
Ahmad Faraz
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कच्चा
सा
घर
और
उस
पर
जोरों
की
बरसात
है
ये
तो
कोई
खानदानी
दुश्मनी
की
बात
है
Saahir
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वो
शाख़
है
न
फूल,
अगर
तितलियाँ
न
हों
वो
घर
भी
कोई
घर
है
जहाँ
बच्चियाँ
न
हों
Bashir Badr
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हमारे
घर
की
दीवारों
पे
'नासिर'
उदासी
बाल
खोले
सो
रही
है
Nasir Kazmi
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तू
ख़ास
था
तू
ख़ास
ही
है
ख़ास
रहेगा
तू
पास
था
तू
पास
ही
है
पास
रहेगा
Jagat Singh
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ख़ूब-सूरत
से
महकने
वाले
ये
इक
फूल
जैसी
ज़िंदगी
गर
तोड़
दो
रब
से
तो
मुरझा
जाती
है
सब
Jagat Singh
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मरना
तो
इक
दिन
होगा
बस
जीना
तो
लेकिन
रोज़
है
Jagat Singh
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मन
के
सारे
सपने
सपने
रह
गए
कितने
थे
हम
और
कितने
रह
गए
जल
चुका
सब
फिर
भी
ऐसा
लगता
है
कोयले
कुछ
अब
भी
तपने
रह
गए
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Jagat Singh
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पूरी
ही
ग़ज़ल
मैंने
लिखी
उसके
लिए
थी
शक
करके
कहा
इस
में
मेरा
नाम
नहीं
है
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Jagat Singh
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