kehne ko yuñ to abr-e-karam qatra-zan hua | कहने को यूँँ तो अब्र-ए-करम क़तरा-ज़न हुआ

  - Jafar Tahir
कहनेकोयूँँतोअब्र-ए-करमक़तरा-ज़नहुआ
वोगुलखिलेनदीमकिख़ून-ए-चमनहुआ
येदाग़-ए-दिलकिजिनसेरिवाज-ए-सहरचला
नोक-ए-मिज़ापेअश्कजोउभराकिरनहुआ
पत्थरकीमूरतेंनज़रआतीहैंचार-सू
यारबतिरेजहाँकोयेक्यादफ़अ'तनहुआ
दोनोंमेंगूँजतीहैंबहारोंकीधड़कनें
मेरीग़ज़लहुईकितुम्हाराबदनहुआ
दोनोंसेहोरहाहैनईसुब्हकाज़ुहूर
तेरीक़बाहुईकिहमाराकफ़नहुआ
'ताहिर'सियाह-फ़ामहुएहमतोग़मनहीं
रौशनहमारेनामसेनाम-ए-सुख़नहुआ
  - Jafar Tahir
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